राष्ट्र प्रेम (देशभक्ति कविता)
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मैं हूँ एक क़लम का सिपाही,
मेरी भारत माँ है बहुत प्यारी।
अपनी क़लम से राष्ट्रीय गीत लिखूंगा,
समस्त जन-जन के घरों तक संदेश फैलाऊंगा।
देशद्रोही और दुश्मनों के ख़िलाफ़ आवाज़ लगाऊंगा,
ग़रीबों और असहायों का सहारा बनूंगा।
सत्य, सनातन, वैदिक एवं दर्शन,
क्षमा, दया, परोपकार एवं समर्पण।
प्राणों से प्रिय है देश हमारा,
मेरे गांव की जमुआरी नदी है न्यारी।
सुख, समृद्धि और वैभवशाली,
मेरे गांव की मिट्टी है बहुत प्रभावशाली।
प्रबलता, उत्कंठा, नीरसता से भरी,
करूणा, दया, याचिका है जीवन से परे।
अत्याचारी, दुराचारी, अधर्मी है बहुत,
धर्म, कर्म व मर्म मानव में है न्यूनतम।
मैं हूँ धरती पुत्र, कृषक सुपुत्र,
कर्म है महान ईश्वर दें हमें सद्ज्ञान।
आओ भारत मां के वीर-सपूतों,
दिखा दो अपना शौर्य और पराक्रमों।
दास्तां और गुलामियों की ज़िंदगी अच्छी नहीं,
दुश्मनों के हाथों शहीद भी हो जाऊं, भले एक क़फ़न तिरंगा में ही सही।
मेरी प्यारी मां! मेरे घर लौटने का कभी इंतज़ार मत करना,
मेरे शहीद होने के बावजूद भी अपनी शेष ज़िंदगी ख़ुशी से व्यतीत करना।
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प्रकाश राय (युवा साहित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार, विचारक, वक्ता एवं समाजसेवी) 🖊️🖊️
सारंगपुर, मोरवा, समस्तीपुर, बिहार
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