🌹🌹 ओ३म् 🌹🌹
🥝 बरेली में गूंजे वेद मंत्र 🥝
ओ३म् आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातन।महे रणाय चक्षसे।।अथर्व०१/५/१
भावार्थ – जैंसे जल खान-पान, खेती-बाड़ी,कला-यंत्र आदि में उपकारी होता है उसी प्रकार यजमानों को अन्न बल और विद्या की वृद्धि से परस्पर वृद्धि करनी चाहिए।
📙 वेदों में जव विज्ञान 📙
उपरोक्त मंत्र में जल व यज्ञ का विनियोग बताकर जल विज्ञान को बताया गया है। सत्य सनातन वैदिक धर्म में यज्ञ से पूर्व आचमन करना अनिवार्य होता है।यह आचमन शब्द संस्कृत के 🌻चम् धातु 🌻 से बना है जिसका अर्थ है पान करना? किसका पान? उत्तर है रस का।रस क्या है?रस दो हैं।एक है प्रकृति का रस जिसका नाम है **जल** दूसरा है उपासना का रस जिसका नाम है** परमानंद**। प्रकृति रस के लिए मंत्र में 🌴 आप:🌴 शब्द है और उपासना रस के लिए 🌴 चक्षुषा 🌴 शब्द है।
इसी आप: शब्द में जल विज्ञान है।यज्ञ का आचार्य अपने यज्ञमान से कहता है कि आचमन में जो जल पान करने जा रहे हो वह तभी सार्थक होगा जब जल के🌲 गुण,कर्म, स्वभाव 🌲 को व्यवहार में लाओगे तो शरीर में वात,पित्त,कफ का हमेशा संतुलन बने रहने से मानव जीवन पर्यन्त निरोग रहेगा उसे कभी अस्पताल नहीं जाना पड़ेगा।
🪷 वात-पित्त-कफ संक्रमण 🪷
शरीर में वात के बिगड़ने से ८० प्रकार के रोग।पित्त के बिगड़ने से ४०-से५० रोग व कफ के बिगड़ने से २८ प्रकार के रोग।कुल १५८ प्रकार के रोगों से बचा सकता है केवल जल विज्ञान को समझने से।
🪴 जल -विज्ञान के ४ सूत्र 🪴
[१] भोजन के अंत में जल के सेवन विषय की तरह होता है। अतः भोजन से एक घंटे पूर्व वा एक घंटे पश्चात जल का सेवन करना चाहिए।
[२] जल कभी भी एक श्वास में न पीवें। मुख के लार से मिश्रित जल जब पेट के अम्ल में मिलता है तो पेट में अम्ल नहीं बनता।पेट में अम्ल न होने पर रक्त में अम्ल नहीं बनता। जिनके रक्त में अम्लता नहीं होती उनका वात,पित्त,कफ संतुलित होता है वे स्वस्थ रहते हैं। अतः जल घूंट
घूंट कर पीना है।
[३] भयंकर प्यास लगने पर भी वाटर कूलर,फ्रिज व वर्फ का पानी नहीं पीना। क्योंकि इनका तापमान शरीर के तापमान से कम होता है। ठंडा पानी शरीर को भी ठंडा कर देता है।
[४] प्रतिदिन उषा पान करने से बड़ी आंत साफ होकर शौच खुलकर आयेगा। प्रातः काल पेट में एसिड अधिक होने से लार युक्त जल पेट में जायेगा तो पेट साफ होगा। तनाव, उलझन,क्रोध नहीं आयेगा। आलस्य,निद्रा, कंठस्थ,कफ नष्ट होगा।
इस जल विज्ञान को यदि राष्ट्र के नागरिक समझें तो प्रति वर्ष लगभग ७ करोड़ रुपये जो राष्ट्र के बेकार जाते हैं उसे राष्ट्र सृजन में लगाया जा सकता है यह उच्च स्तर की राष्ट्र भक्ति होगी। एलोपैथी चिकित्सा में लगभग ९० हजार के आस-पास औषधियां हैं जिसमें मात्र १७० औषधियां ही मतलब की हैं। एलोपैथी औषधियां किडनी,लीवर को खराब करती हैं। आंतों में घाव करती हैं। विकलांगता लाती हैं।ब्रेन हेमरेज, हार्ट अटैक होता है। अतः यज्ञ-आचमन के विज्ञान को जानें।इसके लिए ईश्वरीय वाणी 📙 वेद 📙 की शरण में जाना होगा। महर्षि दयानंद सरस्वती जी नू १९ वीं शताब्दी में ही नारा दिया था।🍁 वेदों की ओर लौटो 🍁 ये व्याख्यान आर्य समाज मंदिर बिहारी पुर के १४१ वें वार्षिकोत्सव पर दिया गया
आर्य समाज मंदिर
विहारी पुर बरेली उ०प्र०
आचार्य सुरेश जोशी