ग़ज़ल
भटकते मन की अभिलाषा का जब विस्तार करते हैं
तभी तो लक्ष्य के सपने को हम साकार करते है
बढ़ाते हैं मनोबल को गुरु सम्मान दे दे कर
तभी हम जिंदगी का गुलसितां गुलजार करते हैं
चुका सकते नहीं माँ-बाप गुरु का कर्ज जीवन भर
भले कोशिश चुकाने का हजारों बार करते हैं
बहुत ही सख़्त दिखते हैं ये ऊपर से जहां वालों
मगर ये राज है दिल से हमें वो प्यार करते हैं
तमामों मुश्किलों से जूझने का गुण सिखाते हैं
कि जिससे ज़िन्दगी की नाव हम उस पार करते हैं
तपाकर आग में कुंदन बना देते हैं मिट्टी को
नमन हम तेज उस ‘प्रतिभा’ को बारम्बार करते हैं
प्रतिभा गुप्ता
खजनी,गोरखपुर