प्यार की इक ज़बान थे पहले-असलम तारिक

ग़ज़ल 

जिस्म दो एक जान थे पहले
प्यार की इक ज़बान थे पहले

ये जो वीरान बस्ती दिखती है
इसमें हर सू मकान थे पहले

बोया करते थे नेकियां दिल से
एक बेहतर किसान थे पहले

सोचते थे बहाने मिलने के
मेरे अरमां जवान थे पहले

उसके अल्फाज़ प्यार में डूबे
खुशियों के तर्जुमान थे पहले

बात की पासदारी रखते थे
बात वाले महान थे पहले

उसके चेहरे पे सिर्फ खुशियों के
खूबसूरत निशान पहले थे

ऐसा तारिक़ था हिज्र का आलम
जैसे अंतर ध्यान पहले थे

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