“”ऋतूनाम कुसुमाकरः “”
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श्रीमद्भगवतगीता के दशम अध्याय के 36 में श्लोक में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं- “ऋतुओं में मैं बसंत हूं” ,
“”ऋतूनामकुसुमाकरः””
निश्चित ही अद्वितीय विशेषण वैशिष्ट्य से अलंकृत वसंत है तभी भगवान कृष्ण वसंत को अपनी विभूति बताते हैं ।
वाह रे वसन्त निश्चित ही आ रहे हो तभी तो चतुर्दिक परिवर्तन दिखाई पड़ रहा है, धरती से गगन तक जड़ से चेतन तक संत से गृहस्थ तक सभी नव अनुराग में आनन्दित है। सब कुछ बदला बदला हैः
वन उपवन पल्लवित पुष्पित है, कोयल के पंचम सुर में मधुरिमा है, आम्र मंजरियो मे भीना सौरभ है, मयूरों का बागों में उन्मुक्त नर्तन है,सरसों गदराई है, महुआ
में कूच लग रहें है, कचनार वसंत आगमन का संवाहक बन गया है,
आकाश स्वच्छ है, मधुर सुगन्ध सनी हवा है, सहनीय ठंडक है, धरा हरी भरी है, लगता है प्रकृति और परमात्मा का गगन व मेदिनी के बीच सुन्दर सुखद सम्मिलन है।
प्रकृति अपने निम्न उपादानों से वसंत का स्वागत करने को उद्यत है, एक नैसर्गिक छटा देखिएः
पल्लवित, पुष्पित, प्रफुल्लित, प्रमुदित सर्षप पीतवसना।
कुरबक, कचनार, अनार, पलाश पुष्प रंजिता।
ताम्रवर्णी ,सुललित ,हरित कोंपलयुतप्रमत्ता। जरी, मदिर मत्त गंध सुवासिता ।
मदन पंचशर संधान उद्यता।
कंज ,मकरंद सरित प्रवाह हंस आच्छादित।
कोकिल कंठ कूक गायन गीतिका।
मिलिंद गुंजन प्रेमराग प्रसारिता।
मत्त मयूर मयूरी नर्तन प्रमत्ता।
पीकहां पपीहा अनुराग राग रंजिता।
मधूक पुष्प रस सिक्त गंध सुगंधिता।
मंदस्मिता,मदमत्त,श्यामा,तन्वंगी,श्रोणी भारात , मदिरेक्षणा,अलस गमना।
मधुमास, वसंत, कुसुमाकर स्वागत उद्यता।
प्रकृति वधू अनुपमेय श्रृंगार सज्जिता।
पुलकित मेदिनी, गगन, ककुभ सुशोभिता।
अनुपमेय सौन्दर्य दर्शिता,मन्मथ सखा सह ऋतुराज आगमनम्।
ऋतुराज बसंत के अद्भुत अलौकिक सौन्दर्य पर न केवल भारतीय देव वाणी संस्कृत, अपितु अंग्रेजी , प्राकृत, हिंदी तथा उर्दू साहित्य के लेखकों ने भी उन्मुक्त हृदय सेअपनी लेखनी चलाई।
आदि कवि वाल्मीकि के श्री राम की सीता के हरण के बाद वसंत कष्ट कारक हो जाता है प्रिया का वियोग कष्टजन्य होता है ।
श्री राम कहते हैंः
अयं वसंतःसौमित्रे,नाना विहग नादित।
सीतया विप्रहीणस्य,शोक संदीपनो ममः।।
हे सुमित्रानंदन अनेक प्रकार के विहंगमों के कलरव से गुंजित यह वसंत का काल सीता से बिछुड़े मुझ राम के लिए बहुत शोक बढ़ाने वाला हो गया है ।
महाकवि कालिदास अपने ग्रंथ ऋतुसंहार में कहते हैंः
द्रुमासपुष्पाःसलिलं सपद्मं,
स्त्रियःसकामाःपवनः सुगंधि।
सुखाः प्रदोषा दिवसाश्च रम्याः,
सर्वमं प्रियं चारुतरं वसंते।।
महाकवि कालिदास कहते हैं कि वसंत के आते ही सब वृक्ष फूलों से लद गए हैं ,जल में कमल खिल गए हैं ,स्त्रियां मतवाली हैं, वायु में सुगंध है ,सांझ सुहानी हैं और दिन लुभवाने हो गए हैं।
आगे लिखते हैंः
नेत्रेषु लोलो मधुरालषेसु,
गंडेषु पांण्डुःकठिनस्तनेषु।
मध्येषु निम्न, जघ्नेषु पीनः,
स्त्रीणांमनंगो ,बहुधा स्थितोअथ।। अर्थात बसंत में कामदेव ने प्रत्येक अंगों में प्रवेश कर लिया है नेत्रों में चंचलता है, कपोलों में पीलापन है, कुचो में कठोरता है, कमर में पतलापन है जांघों में पीनता है ।
इसके बाद हम आगे हिंदी साहित्य में देखते हैं
कवि घनानंद की नायिका सुजान के तन मन में बसंत की छवि छाई हुई हैः
वैसि की निकाई सोई,
ऋतु सुखदाई तामें ।
तरुणाई उलह मदन मयमंन्त है। शोभित सुजान घन आनंद, सुहाग भरै,
तेरे तन मन सदा वसत वसंत है ।।
पद्माकर तो बसंत को हर जगह व्याप्त बताते हैंः
बेलिन वसंत ज्यों नवेलिन वसंत बन बागन बसंत रंगराजन वसंत है।
कुंजन वसंत दिग्पुंजन बसंत
अलि गुंजन बसंत चहु ओरन बसंत है।
छैलन बसंत अरु फैलन वसंत
संग सैलन वसंत बहु गैलन वसंत है ।
रसिक बिहारी नैन सैनन में वैनन में ।
जिते अवलोकौं तिते बरसे बसंत है ।।
आगे चलकर पद्माकर लिखते हैंः
कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में,
कानन में कलित कलीन किलकंत हैं ।
कहैं पद्माकर परागहूँ में, पौनहू में ,
पातन में पिक में पलासन पगंत है।
द्वार में दिशान में दुनी में देश देशन में ,
देखौ दीप दीपन में दीपक दिगंत हैं ।
वीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में ।
वनन में बागन में बगरयौ बसंत है।।
वसन्त की महिमा अपार है, वसंत कामदेव का मित्र है, सृष्टि के सृजन के निमित्त सदा ही कामदेव के साथ रहकर सृजन में सहयोगी बनता है। बिना अंग के समस्त संसार को जीतने वाला ऋतुराज वसंत ही है।
वसंत की महिमा अपरंपार है, टेसू के फूल उसका धनुष है,आम के सुन्दर बौर ही वसंत के बाण हैं, भंवरों की कतार ही उस धनुष की डोर है, मलय पर्वत से आने वाला पवन उसका मतवाला हाथी है, कोयल उसके बंदीजन भांट हैं।
वसंत जड़ चेतन सभी में प्रेम की मिठास भर देता है।सुललित श्रृंगार से सुसज्जित होकर प्रकृति के कण कण में नव अनुराग का सृजन करता है। वसंत निष्काम होकर सृष्टि में कामनाओं को उद्दीप्त करता है।माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि से ही वसंत आगमन प्रकृति स्वीकारती है, कण कण में वसन्त सुसज्जित होकर मस्ती की तरफ आगे बढ़ते हुए फागुन के साथ हिल मिलकर चरम आनन्द की सृष्टि करता है,वासंती हवा तन मन व जीवन को सुगन्ध सिक्त करती है। माघ से बसंत फागुनी रंग में सराबोर हो चरमोत्कर्ष पर पहुचता है। समृद्धि के चरम पर पहुँच कर चैत माह से मिलता है तथा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामके पृथ्वी पर अवतरण के बाद कुछ
माह के लिए विदा होता है।
हर लेखकों की लेखनी ने इस वसन्त के अलौकिक, नैसर्गिक सौन्दर्य को चित्रित करने का प्रयास किया। वसन्त उसी तरह है
जैसे मां सीता का अनुपम सौन्दर्य।
तभी तो गोस्वामी तुलसी दास एक लाइन लिखकर विराम लेते हैं
सब उपमा कवि रहे जुठारी,
केहि पटतरौं विदेह कुमारी।।
वसंत का सौन्दर्य बिहारी की अनिन्द्य सौन्दर्य वती नायिका की तरह है,जितना नजदीक से देखेंगे सौन्दर्य बढ़ता ही रहेगा
ज्यों ज्यों निहारिए नेरे ह्वै नैननि,
त्यों त्यों खरी निकरै सी निकाई।।
और फिर आखिर में सत्यं,शिवमं सुन्दरं अनुपम वसंत की कृपा सभी पर बनी रहे, जीवन में सदा ही वसंत हो।