““वासन्ती गांव””
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वसंती रंग उड़ चला,
प्रकृति वधू के देश।
मन में कचनारी महक, महावरी परिवेश।।1।।
पायल अंगनाई बजी,
घूंघट वाली लाज ।
झीलों में है तैरती,
शहनाई की साज।।2।।
कसी डोलियों ने पुन:, अपनी-अपनी तान।
चोंचें मिली मुंडेर पर,
वरवश बहका प्रान।।3।।
छिपी चांदनी गेह में,
सांकल की आवाज।
नयन चार होते जहां,
गुंथते नये रिवाज।।4।।
ननद ठिठोली कर रही,
भौजाई के ठौर।
मुंह मीठा जल्दी करा,
लगे आम में बौर।।5।।
रंग घुले हर पात पर,
शतरंगी सी भोर।
होंठ गीत झरते मधुर,
मन कहीं हुआ चितचोर।।6।।
पनघट खड़ा निहारता,
तरुणाई अनुरीति।
चलो आज फिर देख लें,
नयी नवेली प्रीति।।7।।
गोपाल त्रिपाठी
शांतिपुरम
प्रयागराज
9889609950