सत्संग  में  जाना -द्वारका प्रसाद तापड़िया

शुरु   किया   ‘सत्संग  में  जाना’, एक  जना यह  बता रहा।
लिए    साथ   में   झंझट   नाना, बरबस ख़ुद को बता रहा।
गमले    में    बरगद   को   पाना, लगन  खतौनी खता रहा।

जड़    की    पूजा   करते-करते, चेतन   देख   नहीं   पाया।
झूठी       हामी       भरते-भरते, हावी  जहँ-तहँ  थी  माया।
बोल    सका   बस   डरते-डरते, साँच  झूठ को कह आया।

मिली   नहीं  किञ्चित  सुरताई, लक्ष्य  और  ही  दूर  हुआ।
चकाचौंध    में    गुम    पुरवाई, कहीं   नदारद   नूर   हुआ।
मन-मन्दिर    बगिया    मुरझाई, धीरज   सारा   चूर   हुआ।

अवगुण  एक  भी कम न देखा, समय  बीतता  चला  गया।
कहे   कोई  सच  दम  न  देखा, अहम्  जीतता  चला गया।
किसी का कुछ भी ग़म न देखा, धर्म   रीतता   चला   गया।

मज़ा  आ  गया  यहीं  शोर  था, खाना-पीना    मस्ती ‌   भी।
मन   में  दुबका  वहीं  चोर  था, ऊँची-नीची     हस्ती    भी।
जाना   उसको  कहीं  ओर  था, गफलत  में  तो  बस्ती  भी।

जमघट    सारा   एक   रंग   में, क़दमताल  में  सच  खोया।
असमंजस   पर  सभी  संग  में, अन्तस   को   देखा   रोया।
जय-जय  डुबकी  लगा  गंग में, मैल   बदन  का  ही  धोया।

वह  था  आम  जनों की चाहत, सच  की  सौरभ प्यारी थी।
आत्म  निरीक्षण ख़ुद को राहत, उजड़  रही  वह क्यारी थी।
स्वयं  श्रेष्ठ  जन  उससे  आहत, वहाँ    गुफ़्तगू   न्यारी   थी।

वन   आबादी   बाग़  गया  वह, प्रीत  बोध  हासिल न हुआ।
झुरमुट  में  फँस जाग गया वह, वह सच में ग़ाफ़िल न हुआ।
जान  छुड़ाकर  भाग  गया वह, शायद  वह क़ाबिल न हुआ।

फ़ुरसत   में   कुदरत  से  यारी, मिली    आज़ादी   जाम  से।
मिली  मति  जो  गई  थी मारी, धोखा   हुआ   था   नाम  से।
‘सदाचार’  शुभ  सम नर-नारी, सारी   सृष्टि   शुभ   राम  से।
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                       द्वारका प्रसाद तापड़िया
                             जयपुर (राज.)
मो. 9460274412

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