ज़मीं से चांद भी बेहतर दिखाई देने लगा-विनोद उपाध्याय हर्षित

ग़ज़ल

तुम आ गए हो तो घर घर दिखाई देने लगा।
ज़मीं से चांद भी बेहतर दिखाई देने लगा।।

उसे जरूर मिलेगा यहां पे हक़ उसका।
अब उसके हाथ में पत्थर दिखाई देने लगा।।

करिश्मा कौन भला रब का जान पाया है।
जहां था सहरा समुन्दर दिखाई देने लगा।।

जिसे तलाशता काशी गया मैं और काबां।
नेहां वो क़ल्ब के अंदर दिखाई देने लगा।।

वो जिसकी राह से कांटे हटाने मैं निकला।
उसी के हाथ में खंजर दिखाई देने लगा।।

हुआ है प्यार मुझे जब से उसकी सीरत से।
वो मुझको और भी सुंदर दिखाई देने लगा।।

वो जिसको वक्त ने पामाल कर दिया हर्षित।
मुझे वो आदमी पत्थर दिखाई देने लगा।।

विनोद उपाध्याय हर्षित

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