मैं सत्य को ही स्वप्न से सुन्दर बनाना चाहती हूँ। प्रतिभा गुप्ता ‘प्रबोधिनी’

ग़ज़ल

ऐ ज़िन्दगी तुमको हमेशा आज़माना चाहती हूँ,
दिल में दबी संवेदना को मैं जगाना चाहती हूँ।

संत्रास की अंधी गुफा में आस का सूरज उगाकर,
नव चेतना उत्साह जन-जन में जगाना चाहती हूँ।

सपना भला किस काम का जो दूर कोसों सत्य से है,
मैं सत्य को ही स्वप्न से सुन्दर बनाना चाहती हूँ।।

दुर्भावना जो स्वार्थ की मदिरा पिये पथ में पड़ी है,
उसको जगाकर मोल जीवन का बताना चाहती हूँ।

ये रंग-मजहब-जाति की सब नागफनियाँ काटकर मैं,
सद्भावना व प्रेम के पौधे लगाना चाहती हूँ।।

तन-मन समर्पित हो सदा अपने वतन के फ़र्ज़ में।
हँसता चमन उजड़े नहीं वो अमन लाना चाहती हूँ।।

आने न पाये आँच अपनी राष्ट्र-गौरव-अस्मिता पर।
‘प्रतिभा’ पलायन रोक देश अपना बचाना चाहती हूँ।

©प्रतिभा गुप्ता ‘प्रबोधिनी’
खजनी, गोरखपुर

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