ग़म – ए – गर्द को हम यूँ ही धो लेते हैं।
छुपा के अश्के समंदर मन में ही रो लेते हैं॥१
कभी चुकाया था हंसने की कीमत उनको।
आज भी तन्हाई में होते हैं तो हँस लेते हैं॥२
सफरे – शराफ़त से ज़िन्दगी शुरू की मैंने।
के शरारत को शराफ़त ही समझ लेते हैं॥३
बे- मुरव्वत ही निकले हैं सब हाकिम मेरे।
फिर भी हर बार उन्हें आदाब बजा लेते हैं॥४
ख़ैर पूछते हैं तो रिआया ही समझ लेते हैं।
एक ही बात पे कई बार सजा देते हैं॥५
इक शिद्दत से दर्दे ग़ैर को समझा भी करो।
पड़ा वक्त तो ये सीने से लगा लेते हैं॥६
फटे हाल हैं तो क्या तुमको सुनायें क़िस्से।
मेरी मर्ज़ी से हम हर हाल में जी लेते हैं॥७
ज़िन्दगी को अपने हिसाब से जी लेते हैं।
गर मिले जो ग़म कहीं बेहिसाब पी लेते हैं॥८
बाल कृष्ण मिश्र “कृष्ण”
१९.१२.२०२३
बूंदी राजस्थान।