मुहब्बत की दुकान बता के खोलते नहीं,
यह तो अपने आप से ही खुल जाती हैं।
कोई हो गैर या हो अपरिचित अपना,
निगाह मिलते मन मंदिर खिल जाती हैं।
चाल और फरेब से जो इसे पाना चाहते,
उन्हें वक्त भी इसकी कीमत बताती हैं।
घुम घुम प्रचार कर जो इसको खोलते,
उन्हें जवाब जनता द्वारा मिल जाती हैं।