कान्हा तेरी वंशी की धुन को दुहराऊँ रे।
तेरी धुन में अपने युग का गीत सुनाऊँ रे।।
ऊँच-नीच औ जाति-धर्म का भेद नहीं था कोई।
आपस में सब मिलकर रहते खेद नही था कोई।।
हे माधव! अब वो समरसता कैसे लाऊँ रे?
तेरी धुन में अपने युग का गीत सुनाऊँ रे ।।१।।
जहाँ प्रेम की माला जपते थे सब भाई-भाई।
अहंकार,प्रतिशोध उन्हीं में देता अब दिखलाई।।
नेह राम औ भरत सरीखा कैसे दिखलाऊँ रे?
तेरी धुन में अपने युग का गीत सुनाऊँ रे ।।२।।
मर्यादा नारी की अब तो नहीं रही मर्यादित।
दुष्ट दुशासन करता है हर अबला को अपमानित।।
दुर्योधन है कौन युधिष्ठिर थाह न पाऊँ रे?
तेरी धुन में अपने युग का गीत सुनाऊँ रे ।।३।।
लगती व्यर्थ यहाँ अबसबको धर्म-कर्म की माला।
मुँहपर सच कहने वाले का दिल ही लगता काला।।
अत्याचार चरम पर केशव! तुमको ध्याऊँ रे।
तेरी धुन में अपने युग का गीत सुनाऊँ रें।।४।।
–प्रतिभा गुप्ता