असहाय संतों के लिए सहारा बने रामदास कोठारी, अब तक 6000 से अधिक संतों का करा चुके हैं उपचार

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या।रामनगरी अयोध्या में जहां एक ओर श्रद्धालु और संत-महात्मा भक्ति और साधना में लीन रहते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे संत भी हैं जिनका बुढ़ापे और बीमारी के दिनों में कोई सहारा नहीं होता। ऐसे ही असहाय और बीमार संतों की सेवा का संकल्प लेकर रामदास कोठारी तिलक द्वार के पास स्थित ‘अस्वस्थ संत सेवा आश्रम’ में वर्षों से अनथक सेवा कार्य कर रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य उन संतों को संबल देना है, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। 6000 से अधिक संतों के इलाज का सराहनीय सफर
रामदास कोठारी अस्वस्थ संतों को तलाशकर आश्रम तक लाते हैं और उनकी बीमारी के अनुसार उचित उपचार की व्यवस्था कराते हैं। वह अब तक 6000 से अधिक संतों के इलाज में प्रत्यक्ष रूप से मदद कर चुके हैं। उनके लिए यह कार्य केवल एक सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि अपने गुरु के आदेश का पालन और सच्ची ईश्वर भक्ति का माध्यम है। संघर्षों से भरा रहा जीवन का सफर रामदास कोठारी के जीवन की कहानी भी संघर्षों से भरी रही है। जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करने के बाद उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग अपनाया था। उन्हें कई बार गृहस्थ जीवन में वापस लाने के प्रयास किए गए, लेकिन ईश्वर के प्रति उनकी अडिग आस्था और संतों के प्रति अगाध श्रद्धा ने उन्हें सेवा के पथ से डिगने नहीं दिया। आज उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन केवल असहाय संतों की देखभाल और सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। गुरु की सीख ने तय की जीवन की दिशा रामदास कोठारी बताते हैं कि उनके गुरु परम सिद्ध, प्रातः स्मरणीय रामहर्षण दास महाराज ने उन्हें सेवा का वास्तविक महत्व समझाया था। गुरुजी अक्सर कहा करते थे कि संतों को भोजन कराने वाले तो बहुत लोग मिल जाते हैं, लेकिन जब संत वृद्ध हो जाते हैं या गंभीर बीमारी से ग्रसित हो जाते हैं, तब उनकी देखभाल करने वाले बहुत कम होते हैं। गुरुजी की इसी प्रेरणादायक सीख ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी।
संतों के चेहरों की राहत ही सबसे बड़ा पुरस्कार रामदास कोठारी का कहना है कि वह अपने गुरु के आदेश का पूर्ण निष्ठा से पालन कर रहे हैं। असहाय संतों की सेवा करके उन्हें असीम आत्मिक शांति और सुकून मिलता है। उनके लिए किसी बीमार संत के चेहरे पर दर्द की जगह राहत और संतोष देखना ही दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार है। अयोध्या में रामदास कोठारी का यह अनूठा प्रयास मानवीय संवेदना, गुरु भक्ति और सेवा भाव की एक ऐसी जीवंत मिसाल है, जो पूरे समाज को बुजुर्गों और असहाय लोगों के प्रति अपने दायित्वों का गहराई से अहसास कराती है।