लखनऊ । बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में ‘पंचकोश आधारित शिक्षा पद्धति: प्रासंगिकता, चुनौतियां एवं कार्यान्वयन’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुक्रवार को समापन हुआ। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल के दिशानिर्देशन एवं संरक्षण में योग विभाग और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन को भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के उत्तर क्षेत्रीय केंद्र, नई दिल्ली ने प्रायोजित किया।समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ और महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के पूर्व कुलपति प्रो. अनिल कुमार शुक्ला उपस्थित रहे। कार्यक्रम में स्कूल ऑफ योगा, नैचुरोपैथी एंड कॉग्निटिव स्टडीज के संकायाध्यक्ष प्रो. बीसी यादव, योग विभागाध्यक्ष डॉ. दीपेश्वर सिंह और कार्यक्रम संयोजक डॉ. नरेंद्र सिंह भी मौजूद रहे। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। विश्वविद्यालय के कुलगीत के बाद अतिथियों को पौधे भेंटकर स्वागत किया गया। प्रो. बीसी यादव ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया, जबकि डॉ. दीपेश्वर सिंह ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत की। संचालन डॉ. दीप नारायण पांडेय ने किया।प्रो. अनिल कुमार शुक्ला ने अपने संबोधन में पंचकोश आधारित शिक्षा पद्धति के विभिन्न आयामों की चर्चा करते हुए मन पर नियंत्रण और सकारात्मक विचारों को व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में गुरु का विशेष महत्व है। गुरु व्यक्ति को सही दिशा दिखाने, आत्मबोध कराने और जीवन के वास्तविक उद्देश्यों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके मार्गदर्शन से व्यक्ति के ज्ञान, विचारों और आचरण में सकारात्मक बदलाव आता है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में पंचकोश आधारित पद्धति को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि इससे युवा भारतीय दर्शन और समृद्ध ज्ञान परंपरा से परिचित होंगे। उन्होंने मनुस्मृति में वर्णित श्लोकों के विभिन्न पहलुओं पर भी चर्चा की और कहा कि व्यक्ति का वास्तविक चरित्र उसके व्यवहार से प्रकट होता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को आत्मबोध से आगे बढ़ाकर परमार्थ और समाज कल्याण के लिए प्रेरित करना भी है।प्रो. बीसी यादव ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मानव जीवन को समझने की व्यापक दृष्टि प्रदान करती है। पंचकोश की अवधारणा के माध्यम से व्यक्ति के विभिन्न आयामों को समझा जा सकता है। इसे शिक्षा से जोड़ने पर विद्यार्थियों में आत्मबोध, सकारात्मक सोच और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने में मदद मिलेगी। योग विभागाध्यक्ष डॉ. दीपेश्वर सिंह ने कहा कि ऐसे आयोजन शोधार्थियों और विद्यार्थियों को स्वयं को समझने तथा अपनी क्षमताओं को पहचानने का अवसर देते हैं। पंचकोश आधारित शिक्षा पद्धति से शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के विभिन्न पहलुओं को समझने में सहायता मिलती है।योग विभाग की शोधार्थी डॉली आर्या ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से पंचकोश आधारित शिक्षा पद्धति की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश की अवधारणाओं को समझाते हुए मानव जीवन में उनके महत्व पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही त्रिदोष, सप्तधातु, जल चेतना और प्राण ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों तथा उनकी कार्यप्रणाली पर भी चर्चा की।सम्मेलन के दौरान विभिन्न विषयों पर विशेष व्याख्यान सत्र आयोजित किए गए। प्रो. पीके चौरसिया की अध्यक्षता में ‘विज्ञानमय कोश एवं शिक्षा—विवेक, चिंतन, अनुसंधान एवं निर्णय क्षमता’ विषय पर पहला व्याख्यान सत्र हुआ। दूसरा सत्र भौतिक विज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के प्रो. बीसी यादव के मार्गदर्शन में ‘आनंदमय कोश एवं शिक्षा—चरित्र निर्माण, आत्मबोध एवं जीवन मूल्यों की स्थापना’ विषय पर आयोजित किया गया। इसके अतिरिक्त ‘पंचकोश आधारित पाठ्यचर्चा, शिक्षण पद्धति एवं मूल्यांकन मॉडल का निर्माण’ विषय पर पैनल चर्चा हुई। प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों से विषय से जुड़े सवाल पूछकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया।
सम्मेलन में शोधपत्र प्रस्तुत करने वाले प्रतिभागियों को उनके शोध एवं अकादमिक योगदान के लिए प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। आयोजन समिति ने अतिथियों को स्मृति चिह्न और शॉल भेंटकर सम्मानित किया। अंत में डॉ. नरेंद्र सिंह ने सभी अतिथियों, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। समापन कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।