संभावनाओं के बीच अपना मार्ग चुनना
जीवन कभी एक सीधी रेखा पर चलने वाली यात्रा नहीं है। वह हर क्षण हमारे सामने अनगिनत संभावनाओं के द्वार खोलता है। कुछ संभावनाएँ हमें परिस्थितियाँ देती हैं, कुछ अवसर हमें समय देता है और कुछ संभावनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें हम अपनी सोच, अपने साहस और अपने कर्मों से स्वयं जन्म देते हैं। लेकिन इन संभावनाओं में से हम क्या चुनते हैं, यही हमारे व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माण करता है।
एक ही परिस्थिति में खड़े दो व्यक्ति बिल्कुल अलग निर्णय ले सकते हैं। एक व्यक्ति कठिनाई को अपनी हार मानकर बैठ सकता है, जबकि दूसरा उसी कठिनाई को अपनी शक्ति बनाने का अवसर समझ सकता है। अंतर परिस्थितियों में नहीं, बल्कि उन्हें देखने वाली दृष्टि में होता है। जीवन हमें क्या देता है, यह हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता; लेकिन जो मिला है, उसके साथ हम क्या करते हैं, यह बहुत हद तक हमारे हाथ में होता है।
मनुष्य के भीतर उठने वाली इच्छाएँ भी उसकी यात्रा को दिशा देती हैं। इच्छा यदि केवल भोग की हो तो वह हमें सुविधाओं का दास बना सकती है, लेकिन वही इच्छा यदि उद्देश्य से जुड़ जाए तो वह संकल्प बन जाती है। संकल्प जब कर्म से जुड़ता है तो संघर्ष जन्म लेता है और संघर्ष जब निरंतरता प्राप्त करता है तो वही सफलता की राह बनाता है।
हमारे संस्कार भी हमारी संभावनाओं का चुनाव करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। घर, परिवार, समाज और हमारे अनुभव हमें यह सिखाते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में टूटना है या उनसे लड़ना है; दूसरों को दोष देना है या स्वयं को बदलना है; आसान रास्ता चुनना है या सही रास्ते पर चलना है। संस्कार हमारे भीतर वह आवाज बन जाते हैं जो कठिन समय में हमें बताती है कि हमें क्या करना चाहिए।
हर व्यक्ति के जीवन में मिलने वाली संभावनाएँ समान नहीं होतीं। किसी को संसाधन अधिक मिलते हैं, किसी को कम। किसी के रास्ते में फूल बिछे होते हैं तो किसी को काँटों पर चलना पड़ता है। किसी को अवसर सहज मिल जाते हैं तो किसी को अवसर पैदा करने पड़ते हैं। लेकिन एक संभावना सबके पास समान रूप से होती है—अपने भीतर की शक्ति को पहचानने की संभावना।
यही कारण है कि संघर्ष को केवल दुर्भाग्य समझना उचित नहीं। कई बार संघर्ष ही हमारे व्यक्तित्व का सबसे बड़ा निर्माता बन जाता है। कठिनाइयाँ हमें वह सिखा देती हैं जो सुविधा कभी नहीं सिखा सकती। ठोकरें हमें अपने पैरों की ताकत का पता देती हैं और असफलताएँ हमें अपनी कमियों से परिचित कराती हैं।
कुछ संभावनाएँ जीवन हमें देता है और कुछ संभावनाएँ हमें स्वयं पैदा करनी पड़ती हैं। यदि रास्ता नहीं मिलता तो रास्ता बनाना पड़ता है। यदि अवसर नहीं मिलता तो अपनी योग्यता से अवसर पैदा करना पड़ता है। यदि परिस्थितियाँ साथ नहीं देतीं तो परिस्थितियों के बीच से अपनी राह निकालनी पड़ती है।
इसलिए जीवन की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि हमें कितनी सुविधाएँ मिलीं। असली सफलता इस बात में है कि उपलब्ध परिस्थितियों के बीच हमने अपने लिए क्या बनाया। हमने अपने भीतर कितनी आग बचाए रखी, कितनी बार गिरकर उठे और कितनी बार स्वयं से कहा—अभी यात्रा समाप्त नहीं हुई है।
नियति हमारे सामने परिस्थितियाँ रख सकती है, लेकिन उन परिस्थितियों के सामने हमारा रवैया हमारी पहचान बनाता है। नियति हमें चुनौती दे सकती है, पर उसे स्वीकार करके आगे बढ़ने का जज़्बा हमारा अपना होता है। जीवन की सबसे बड़ी जीत शायद यही है कि हम परिस्थितियों के हाथों कठपुतली बनकर न जिएँ, बल्कि अपनी चेतना, अपने संस्कार और अपने कर्मों से अपने जीवन की दिशा स्वयं निर्धारित करें।
आखिर वह जीवन भी क्या, जो बिना किसी संघर्ष के आसानी से निकल जाए? जिस जीवन में प्रश्न न हों, चुनौतियाँ न हों, गिरना न हो, उठना न हो—वह जीवन शायद बीत तो जाए, लेकिन अपनी कहानी नहीं छोड़ता।
जीवन का सौंदर्य इसी में है कि हर मोड़ पर हमारे सामने कुछ संभावनाएँ खड़ी होती हैं और हम उनमें से एक को चुनते हैं। वही चुनाव धीरे-धीरे हमारी आदत बनता है, आदत हमारा चरित्र बनती है और चरित्र अंततः हमारी पहचान।
इसलिए जब जीवन अगली बार कोई कठिन परिस्थिति आपके सामने रखे, तो उसे केवल बाधा मत समझिए। संभव है, उसी के भीतर आपकी अगली संभावना छिपी हो। संभव है, वही संघर्ष आपको उस व्यक्ति में बदलने आया हो, जो आप वास्तव में बन सकते हैं।
क्योंकि जीवन हमें केवल अवसर नहीं देता—वह हमें अवसर बनाने का अवसर भी देता है।
डॉ दीपा शर्मा उजाला
फरीदाबाद