यह भारत की जनता है साहब

यह भारत की जनता है साहब!

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यह जनता है। कुछ जानती समझती है, और कुछ भेड़-चाल में चलती है। हाँ, यही भारत की जनता है।

 

वो जमाना गया जब लोग देश की आजादी के लिए मरने को तैयार थे। आज लोग दो हजार रुपये में बिकने को तैयार हैं। यह वही जनता है जो चुनाव में एक शराब की बोतल पर बिक जाती है। गाड़ी दरवाजे पर लेने आ जाए तो अपना मन बदल लेती है, और जो सवाल पूछने से डरती है।

 

यह कैसी जनता है जो लोकतंत्र और संविधान की हत्या का शोर मचाती है, पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक को नहीं मानती? यह वही जनता है जो कर्ज न चुका पाने पर आत्महत्या कर लेती है और फिर भी उसी व्यवस्था को वोट दे आती है। जो अपने बच्चों को स्कूल इसलिए भेजती है कि वहाँ दो वक्त का खाना तो मिल जाएगा।

 

यह कोई अलग जनता नहीं है। यह हमारे देश की ही बड़ी सुसंस्कृत जनता है। जिसे अपने देश के योग पर भरोसा नहीं, पर वही योग जब विदेश से होकर इंस्टाग्राम रील पर आता है तो सिर आँखों पर बिठा लेती है। जिसे नीम की दातुन पर भरोसा नहीं, पर उसी पर अमेरिका का ठप्पा लग जाए तो वह टूथपेस्ट बन जाती है।

 

इसी जनता से जब कहा जाता है – घर-घर तिरंगा फहराओ, तो यह तिरंगा फहराती है। जब कहा जाता है थाली बजाओ, तो थाली बजाती है। ताली बजाओ तो ताली बजाती है। और फिर यही जनता हाथ में तिरंगा लेकर सड़क पर भी उतर आती है। इसे आप भेड़-चाल कहें या भोलापन, पर यही इसकी सच्चाई है।

 

चार लोग दिल्ली से, चार बिहार से, चार पंजाब से आकर हल्ला मचाते हैं और 140 करोड़ के देश की किस्मत का फैसला करने लगते हैं। और जनता? वह टीवी पर यह सब देखती रहती है।

 

कोई आकर कहता है – तुम्हारे अधिकार खत्म हो रहे हैं। तो यह जनता जो अभी तक सुख की नींद सो रही थी, बिना उस कहने वाले की नीयत परखे, उठकर खड़ी हो जाती है।

 

पर सच में क्या चाहती है यह जनता?

 

इसे धरने-प्रदर्शनों से कोई मतलब नहीं है। यह तो बस दो वक्त की रोटी और सुख की नींद चाहती है। यह चाहती है कि शांति से अपना व्यापार चलाए, ईमानदारी की रोटी घर लाए।

 

यह नहीं जानती कि बड़े-बड़े बंगलों में कैसे रहा जाता है। बिना किसी काम के बड़ी-बड़ी गाड़ियों में कैसे घूमा जाता है। यह नहीं जानती कि कोई बेरोजगार व्यक्ति कैसे चार दिन में चार बार प्लेन से दिल्ली आ-जा सकता है और इतने बड़े-बड़े खर्चे उठा सकता है। यह सचमुच नहीं जानती।

 

यह तो बस अपने दो कमरे के घर में सुख से रहना चाहती है। दिनभर का थका-हारा शाम को जब टीवी खोले तो परिवार के साथ शांति से कुछ देख सके। जहाँ संविधान और लोकतंत्र के नाम पर गाली-गलौज न हो।

 

भारत की जनता ने बहुत आंदोलन देखे हैं, पर आक्रोश में भी यह कभी असंयमित नहीं हुई। इसने अंग्रेजों को भी ऐसे अपशब्द नहीं कहे जैसे आज अपने ही लोग एक-दूसरे को कहते हैं।

 

इसलिए यह जनता बस हाथ जोड़कर एक विनती करती है – मुझे भी समझो। नेताओं के नाम पर, लोकतंत्र के नाम पर बार-बार मत छलो। मैं ठगी जाना नहीं चाहती, मैं सिर्फ जीना चाहती हूँ।

में भारत की भोली भाली जनता हूँ। दीपा शर्मा ‘उजाला’ फरीदाबाद