आस्था की पहली पुकार: फरीदाबाद से हरिद्वार

संस्मरण

आस्था की पहली पुकार: फरीदाबाद से हरिद्वार

 

बचपन में माँ जब भी हाथ सहलाकर प्यार से कहती थी, “तू मेरी नहीं, माँ गंगा की मन्नत है… उनसे माँगकर लाई हूँ तुझे,” तो दिल में एक अजीब सा अहसास तैर जाता था। आँखों के सामने एक पावन छवि बन जाती और मन अनजाने में ही उस अदृश्य ‘गंगा माँ’ से एक अनोखा, आत्मीय रिश्ता जोड़ लेता। लेकिन उस ममतामयी गंगा के प्रत्यक्ष दर्शन का सौभाग्य मिलते-मिलते उम्र के तीस बरस बीत गए।

 

वह दिन किसी उत्सव से कम नहीं था, जब हमने परिवार की पहली गाड़ी खरीदी थी। घर में खुशियों का माहौल था, लेकिन मेरे लिए गाड़ी का सुख या लंबी सैर से भी ज़्यादा बड़ा उत्साह उस पुराने रिश्ते से मिलने का था, जो बरसों से मेरे भीतर एक बीजरूप में अंकुरित हो रहा था। हमने तय किया कि अपनी इस पहली गाड़ी की सबसे पहली यात्रा फरीदाबाद से हरिद्वार और ऋषिकेश की होगी।

 

सुबह-सुबह दोनों बच्चों को साथ लिया, आवश्यक सामान और स्नान के कपड़ों का एक बैग सहेजा और हम निकल पड़े। रास्ते में बच्चों की चहक, उनके खाने-पीने की छोटी-छोटी ख़वाहिशें और लगभग पाँच घंटे का लंबा सफ़र कब बीत गया, पता ही नहीं चला। बच्चे बेहद ख़ुश थे, पर मेरे मन में श्रद्धा और उत्सुकता का एक अलग ही ज्वार उठ रहा था।

 

जैसे ही फरीदाबाद की सीमाओं से निकलकर हमने हरिद्वार की पावन धरा पर पहला कदम रखा, हवा का हर एक झोंका ताज़गी और अपार सकारात्मक ऊर्जा से भरा महसूस हुआ। लगा जैसे फेफड़ों में एक नई साँस, एक नया जीवन भर गया हो।

 

गाड़ी पार्किंग में खड़ी कर, हम जल्दी-जल्दी हर की पौड़ी की ओर बढ़ने लगे। पुल पार करने से पहले ही अचानक दूर से माँ गंगा का वह विहंगम रूप दिखाई दिया। उछलती-कूदती, तीव्र वेग से बहती हुई गंगा जल की धारा ऐसी प्रतीत हो रही थी, मानो वह भी दोनों बाहें फैलाए अपनी उस बेटी का स्वागत करने के लिए आतुर खड़ी हो, जिसे उसने बरसों पहले किसी माँ को मन्नत में दिया था।

 

उस दृश्य को देखते ही मेरी आँखों के कोने भीग गए। खुशी और भावुकता के वे आँसू मैंने चुपके से पोंछ लिए, क्योंकि उस असीम आध्यात्मिक अहसास को शब्द देना आसान नहीं था।

 

और फिर वह क्षण आया जिसका मुझे तीस वर्षों से इंतज़ार था। मैं उस पावन जल में उतर गई। मैंने माँ गंगा को दूध से अभिषेक किया और उन्हीं के पवित्र जल से उनका अभिषेक करके जब बाहर आई, तो लगा जैसे मन और शरीर दोनों ऐसे पवित्र हो गए हैं, जैसे मैंने अभी-अभी जन्म लिया हो। वह एहसास पवित्रता का था, सरलता का था, और एक सच्चाई का था — जो उस पावन जल में स्नान करने के बाद ही मुझे मिला।

 

मैं बेटी बनकर जरूर आई थी, पर मैं माँ भी हूँ। बच्चों का आकर्षण गंगा स्नान के साथ-साथ वहाँ के बाज़ार में घूमना और खाना भी था। हम फिर किसी एक होटल में गए, वहाँ खाना खाया, पर मेरा मन बार-बार उस गंगा की ओर ही खिंचा जा रहा था। खुली आँखों से भी मुझे वही गंगा की लहरें दिखाई दे रही थीं।

 

आज जब मैं इस संस्मरण को लिख रही हूँ, तो भी मेरी आँखें भीगी हुई हैं। मेरी आँखों से वही गंगा जल बह रहा है, क्योंकि मेरे मन में, मेरी आँखों के आगे वही विहंगम दृश्य — माँ गंगा का बहता हुआ आँचल — लगातार बहता जा रहा है।

 

फरीदाबाद से शुरू हुई वह यात्रा सिर्फ एक शहर से दूसरे शहर की यात्रा नहीं थी, बल्कि अपनी जड़ों, अपनी आस्था और उस ‘दिव्य माँ’ से मिलने का एक भावुक संस्मरण बन गई, जो जीवन भर मेरी आत्मा में बहती रहेगी।

 

डॉ दीपा शर्मा उजाला

फरीदाबाद