अनुराग लक्ष्य, 25 सितंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
शह ए बग़दाद के आक़ा मेरे महबूब ए सुब्हानी,
दो आलम में भी हैं आला मेरे महबूब ए सुब्हानी ।
नज़र तो यह भी कहती है कि हो दीदार गर तेरा,
जहाँ मिल जाएगा सारा मेरे महबूब ए सुब्हानी ।
पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए कितने फख्र की बात है। क्योंकि जैसे मदीने के ताजदार मुस्तफा जान ए रहमत का महीना बारह रबीउल अववुल ख़त्म होता है, उसके तुरन्त बाद शहंशाह ए बग़दाद पीरान ए पीर दस्तगीर सैयद शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी का महीना ग्यारहवीं शरीफ हमको मिल जाता है। जिसको पूरी दुनिया में बहुत ही अकीदत और मुहब्बत के साथ मनाया जाता है।
खुशी की बात है कि बस्ती जनपद में भी एक लंबे समय से शहंशाह ए बग़दाद पीरान ए पीर दस्तगीर सैयद शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी के दीवाने भी अपने अकीदत का परचम लहराते हुए नज़र आते हैं।
सुबह नमाज़ ए फज्र के बाद ईदगाह से निकलने वाला यह जुलूस अपने रवायती अंदाज़ में टाऊन क्लब, पक्के बाज़ार, गांधी नगर चौक, दरिया ख़ां, कटेश्वर पार्क, रोडवेज़ चौक, दक्षिण दरवाज़ा, मंगल बाज़ार से गुजरकर अपने गंतव्य तक पहुंचता है।
जहाँ सलात ओ सलाम के साथ संपन्न होता है।
इस साल भी बस्ती शहर से में यह जुलूस अपनी परंपरा के अनुसार अपनी आन बान और शान के निकला, जिसमें शहर के उलमा हज़रात की लंबी तादाद के साथ शहर के रहने वाले अकीदतमंदों का हुजूम भी शामिल हुआ।
जुलूस के दौरान पुलिस प्रशाशन चुस्त और दुरुस्त दिखाई दिया ।