उस पे जादू का ऐसा असर हो गया।

ग़ज़ल

कल था मेरी तरफ़ अब उधर हो गया,
उस पे जादू का ऐसा असर हो गया।

उस ने ज़ानू पे सर मेरे क्या रख दिया,
मुख़्तसर कितना मेरा सफ़र हो गया।

लत हवेली पे जाने की ऐसी पड़ी,
दीन-ओ-दुनिया से मैं बेख़बर हो गया।

बेच दी मैंने अपनी अना जिस घड़ी,
मेरे बाज़ू पे सोने का पर हो गया।

कितनी दूरी बना कर रहा मुझ से वो,
वक़्ते रुख़्सत मगर हमसफ़र हो गया।

सर जो खोले हुये छत पे तुम आ गये,
कितना शर्मिंदा देखो क़मर हो गया।

छेड़ती हैं मछलियाँ उसे अब नदीम,
जब से साधू वो बूढ़ा मगर हो गया।

नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥