वरिष्ठ कवयित्री डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय ‘पूर्णा’ की 

पुस्तक समीक्षा

छंदों का लघु ग्रंथ छंद मणिका

 

समीक्षक- सुधीर श्रीवास्तव

 

वरिष्ठ कवयित्री डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय ‘पूर्णा’ की

लोकरंजन प्रकाशन, प्रयागराज से प्रकाशित कृति ‘छंद मणिका’ में लगभग सौ कविताओं और विविध रचनाओं में अनेक भावों, विषयों और छंद-विधान को समेटे और अपने स्वर्गीय पिताजी चंद्रशंकर दूबे जी को समर्पित संस्कारित सृजन-यात्रा को भीतर से प्रेरणा, ऊर्जा का प्रतीक है।

मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि मुझे छंदों का ज्ञान नहीं है। फिर भी अब तक की अपनी साहित्यिक यात्रा के अनुभवों के आधार पर मैं यह जरुर कह सकता हूं कि ‘छंद मणिका’ में विविध छंदों की रचनाओं का समावेश के साथ बहुत-से छंदों के काव्यात्मक नियमों और उनके उदाहरणों का समावेश है। जो नवोदित रचनाकारों के साथ छंदों के सहयात्रियों के लिए बेहद उपयोगी साबित होने वाला है।

डा. पूर्णा ने छंदों की लय, गति और विधान को विषयानुकूल भावों के साथ जोड़ने की अपनी यात्रा में धार्मिक, सामाजिक संस्कारिक,और रीति-रिवाजों से जोड़ने का सुंदर चित्रण प्रस्तुत किया है।जिसे साहित्य प्रेमियों के साथ आम जनमानस को जागरूक करने के साथ परंपराओं, मान्यताओं और धार्मिक भावनाओं को महसूस कर आत्मसात कराने का उत्कृष्ट प्रयास भर नहीं है। बल्कि एक कलमकार के साथ धर्म, समाज, परंपरा, प्रकृति से जोड़ने की नैतिक जिम्मेदारी का निर्वहन भी है।

डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय ‘पूर्णा’ के प्रस्तुत संग्रह की रचनाएं सरल, सहज, भाव, भाषा और आकृष्ट करने की क्षमता से सुसज्जित हैं। जिसे पाठक आसानी से समझ कर आत्मसात तो कर ही सकता है, और साथ खुद चिंतन कर उसकी गहराई भी महसूस कर सकता है।

प्रस्तुत संग्रह‘छंद मणिका’ को महज काव्य संग्रह समझने/कहने के बजाय बहुपक्षीय लघु ग्रंथ का दस्तावेज कहा जाय तो संभवतः अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि संग्रह की रचनाओं पर गौर किया जाए तो हम महसूस कर सकते हैं कि हर कविता, पंक्ति और शब्द में कवयित्री ने सिर्फ एक कलमकार के बजाय आम जन की दृष्टि, श्रद्धा और विश्वास के नजरिए से प्रस्तुत किया है।

मेरा विश्वास है कि डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय ‘पूर्णा’ की ‘छंद मर्णिका’ उनके साहित्यिक जीवन की अनमोल निधि साबित होगी। जो उन्हें एक विशिष्ट पहचान दे सकती है। संभवतः यह उनके निजी जीवन की सोच, समर्पण, श्रद्धा , विश्वास और धर्म, अध्यात्म के प्रति समर्पण के विविध धार्मिक/ सामाजिक/साहित्यिक यात्राओं की बहुलता का परिणाम है।

छंद मर्णिका की सफलता और डा. पूर्णा के सुखद उज्ज्वल भविष्य की कामनाओं के साथ सादर नमन वंदन।