गुरु कुम्हार के समान, शिष्य कच्चे घड़े की तरह : प्रदीप कुमार कुशवाहा
शिक्षक दिवस पर कबीर के दोहे के माध्यम से भावनात्मक संबल, अनुशासन और चरित्र-निर्माण का संदेश
लवकुश सिंह संवाददाता
अनुराग लक्ष्य न्यूज बस्ती
लखनऊ। शिक्षक दिवस के अवसर पर दार्शनिक एवं चिंतक प्रदीप कुमार कुशवाहा ने संत कबीरदास के प्रसिद्ध दोहे “गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥” के माध्यम से गुरु-शिष्य संबंध की गहनता और शिक्षक की भूमिका को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि कबीरदास जी ने शिक्षक की तुलना कुम्हार और विद्यार्थी की तुलना कच्चे घड़े से करते हुए शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को अत्यंत सरल एवं प्रभावशाली ढंग से समझाया है। जिस प्रकार कुम्हार घड़े को मजबूत और सुंदर आकार देने के लिए भीतर से सहारा देता है तथा बाहर से आवश्यक चोट करता है, उसी प्रकार एक आदर्श शिक्षक विद्यार्थी की कमियों को दूर करते हुए उसे जीवन के लिए तैयार करता है।
श्री कुशवाहा के अनुसार, आज के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और मानसिक तनाव वाले दौर में शिक्षक के लिए अनुशासन और भावनात्मक संबल के बीच संतुलन अत्यंत आवश्यक है। शिक्षक बाहर से विद्यार्थी को नियम, अनुशासन और जिम्मेदारी का बोध कराए, वहीं भीतर से उसे विश्वास, प्रोत्साहन और भावनात्मक सहारा प्रदान करे, ताकि विद्यार्थी दबाव में टूटे नहीं, बल्कि परिस्थितियों से सीखकर और अधिक मजबूत बने।
उन्होंने कहा कि वर्तमान परिणाम-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था में इस दृष्टिकोण की विशेष आवश्यकता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छे अंक प्राप्त करना या परीक्षा उत्तीर्ण करना नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थी के व्यक्तित्व, चरित्र, आत्मविश्वास और मानवीय मूल्यों का विकास भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि गुरु विद्यार्थी के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानकर उसे सही दिशा देने का कार्य करता है। शिक्षक की सीख, अनुशासन और प्रेरणा विद्यार्थी के जीवन में लंबे समय तक मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है।
शिक्षक दिवस पर उन्होंने अपने जीवन में सीखने, आगे बढ़ने और जीवन जीने की प्रेरणा देने वाले सभी मार्गदर्शकों, शिक्षकों एवं प्रेरणास्रोत व्यक्तित्वों को कोटि-कोटि नमन करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।