मैं अपने ख़ुद के मोबाइल का नंबर भूल जाता हूँ

ग़ज़ल

गली तो याद रहती है मगर घर भूल जाता हूँ,
मैं अपने ख़ुद के मोबाइल का नंबर भूल जाता हूँ

मिला हो कोई मुझ से चाहे जितनी बार भी लेकिन,
वही फिर से मिला तो नाम अक्सर भूल जाता हूँ।

तक़ाज़ा उम्र का हो या इसे बीमारी समझो तुम,
नवम्बर याद रहता है दिसम्बर भूल जाता हूँ।

दुबारा फिर मिलूँगा उस से मैं वादा तो करता हूँ,
मगर अपने किए वादे को अक्सर भूल जाता हूँ।

ख़फ़ा रहता है मुझ से यूँ नहीं वो आसमाँ वाला,
झुकना सर को है किस दर पे वो दर भूल जाता हूँ।

चला कर जिसने मारा था वो चेहरा याद रखता हूँ,
मगर सर पे लगे पत्थर को अक्सर भूल जाता हूँ।

नदीम उस गाँव की पगडंडिया तक याद है मुझ को,
गुजरती है वहाँ से जो नहर मैं भूल जाता हूँ।

नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥