संतों के सानिध्य से जीवन होता है धन्य, गुरु-शिष्य परंपरा ही सनातन का गौरव महंत गणेशदास

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। श्री अवध बिहारी कुंज के पूर्वाचार्य, अनंत श्री विभूषित महंत रामसुखित दास फलाहारी महाराज की पांचवीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में संतों का समागम हुआ। इस दौरान ‘श्री भगवान अवध बिहारी रामानुज सेवा ट्रस्ट’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर महंत डॉ. गणेश दास महाराज ने उपस्थित भक्तों को संबोधित किया।
कृष्ण-सुदामा की मित्रता का दिया उदाहरण अपने संबोधन के दौरान महंत गणेश दास महाराज ने भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता का भावपूर्ण उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा के प्रति निस्वार्थ प्रेम और समर्पण दिखाकर मित्रता की एक अनुपम मिसाल कायम की, वैसी ही पवित्रता गुरु-शिष्य और संतों के संबंधों में होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि सनातन परंपरा का वैभव इन्हीं संबंधों में निहित है। सेवा ही सच्चा धर्म महंत जी ने बताया कि जीवन में गुरु की कृपा से ही सेवा, साधना और धर्म का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने कहा संत सेवा, गौ सेवा, ब्राह्मण सेवा और दरिद्र नारायण की सेवा ही सच्चा धर्म है। महंत रामसुखित दास महाराज ने इन आदर्शों को अपने जीवन में पूर्णतः आत्मसात किया था।” श्रद्धांजलि सभा में उमड़े श्रद्धालु इस भव्य आयोजन में संतों, महंतों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में भजनानंदी संतों द्वारा भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर महंत मुरली दास महाराज, श्री संकट मोचन सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत संजय दास सहित अयोध्या के कई प्रमुख संत-महंत उपस्थित रहे।महंत रामसुखित दास फलाहारी महाराज की 5वीं पुण्यतिथि। स्थान श्री अवध बिहारी कुंज, अयोध्या। प्रमुख संदेश गुरु-शिष्य परंपरा और निस्वार्थ सेवा का महत्व। विशेष संदर्भ कृष्ण-सुदामा की मित्रता के माध्यम से धर्म की व्याख्या।