आप भी मेरी तरह गर हैं सिपाही मुल्क के, बोलिए कैसे तिरंगे की हिफाज़त छोड़ दूँ, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,
अनुराग लक्ष्य, 26 जनवरी
मुम्बई संवाददाता ।
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
ऐ ख़ुदा मुझको वोह ईमान की दौलत दे दे,
जी सकूं जिससे मैं दुनिया में वोह इज्ज़त दे दे ।
कर दूं आबाद हर इक सिम्त मुहब्बत की फ़िज़ा
मेरे हाथों में तू इक ऐसी हुकूमत दे दे ।।
चाहते हैं वोह वतन से मैं मुहब्बत छोड़ दूँ,
है जो अपने मुल्क की कैसे सदाकत छोड़ दूँ ।
आप भी मेरी तरह गर हैं सिपाही मुल्क के,
तो बोलिए कैसे तिरंगे की हिफाज़त छोड़ दूँ ।।
सामयीन आप यकीन मानें कि ग़ालिब, मीर, फ़ैज़, दाग़ और फ़िराक़ गोरखपुरी से होती हुई शायरी जो मेरी दहलीज तक पहुंची, उससे मैने बेपनाह मुहब्बत की, और यह उसी की देन है कि मैं आज हिंदुस्तान के मायनाज़ हस्तियों के बीच खड़े होकर कुछ कहने और सुनने की जसारत करता हूँ। इसी लिए आज गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी अपने कुछ महकते और खनकते जज्बात के साथ आप से रूबरू हो रहा हूँ ।
1 / मेरे बुजुर्गो के सर की पगड़ी जो हो सके तो बचाए रखना,
दिलों में उनकी नसीहतों के जो फूल हैं वोह खिलाए रखना,
यह वक्त ऐसा ही आ गया है कि फिक्र करने की है ज़रूरत,
किसी भी सूरत में अपने घर को मुहब्बतों से सजाए रखना,,,,,
2/ दिख रही है आज जो हर दिल में आग,
डाल देगी कल तुम्हें मुश्किल में आग,
धर्म और मज़हब के परचम क्या उठे,
चाँद सूरज तारों की झिलमिल में आग,,,,
3/ दूर गगन की छांव में होता कहीं इक छोटा सा घर,
तारे ज़मीं पे घूमने आते हम पूछते आसमाँ की डगर,
काश यहाँ कुछ ऐसा होता, दिल सबका इक जैसा होता,
न भूख होती न प्यास होती,
खुशियाँ ही खुशियाँ आतीं नज़र,,,,
4/ मिलेगी दौलत ओ शोहरत स्यासत की ज़मीनें भी,
करो जब भी कोई वादा तो वादे से मुकर जाओ,
न यह कुरुक्षेत्र है न कर्बला यह जंग ए इंसाँ है,
तुम इनके पास जब जाओ लिए लाल ओ गुहार जाओ,,,,
5 / तालियों की गड़गड़ाहट से दबा जाता हूँ मैं,
शेर कहता हूँ तो गज़लों में समा जाता हूँ मैं ,
हमने माना मीर ओ ग़ालिब का नहीं है दौर यह,
फिर भी शौक ओ ज़ौक से अब भी सुना जाता हूँ मैं,,,,
6/ नफ़रत की जगह प्यार अगर हो गुमान में,
दुश्मन भी तुमसे बोलेगा शीरीं ज़बान में,
इक दिन मैं तुमसे बात करूंगा यहाँ ज़रूर,
पहले मैं तुमको ढाल लूं अपनी उड़ान में,,,,
7 / मैं कहां कहता हूँ मुझको प्यार दो और प्यार लो,
मैं कहां कहता हूँ मुझपे ज़िंदगी तुम वार दो,
मैं तो पहले से ही शोलों में घिरा हूँ ऐ सलीम,
तुम जिसे चाहो मुहब्बत का उसे संसार दो,,,,