अरी बहना सुनो तो
जरा कभी विचार किए हो
अगर ये पेट ना होता तो क्या होता?
सखी: नहीं नहीं, मनने तो कबहुं विचार ना कियो । पर जानत हैं ,
अगर ये पेट ना होता तो ,
हमार बलमुआ काहे को परदेश जाते भला ।
तुम जानत हो सखी,
पिछले साल बरसात में ,
सारी फसल बर्बाद हो गइल बा।
पेट के खातिर ,
तोहार बलमुआ, हमार बलमुआ,
सबही के बलमुआ परदेस भईल।
यही पेट के खातिर ना सखी।
तीन पहीर के भोजन जो पके है।
सासू मां के भी ना ,
सरसों के साग चाही भात पर।
नूनिया भी तो अब फरमाइश करे ल सीख गईल है।
यही पापी पेटवा के खातिर ना ।
अगर ई पेट ना होता तो भूखिया तो नाही लगती। और जब भूखे ना लगती तो ,
बलमुआ काहे को जाते ,
हमरा के छोड़ के परदेस ओ सखी।
स्वरचित (मौलिक)
ज्योती वर्णवाल