शब्द बिखरे-बिखरे क्यों
लिखना चाहूँ कविता पर,
जाने क्यों बहती रसधार नहीं।
प्रकृति की छटा लगे निराली,
फिर भी भावों का अंबार नहीं।।
भाव क्यों निर्जीव हुए मन के,
सजती शब्दमालिका नहीं।
गाँव सा वातावरण यहाँ फिर भी,
अलंकारों की कलिका नहीं।।
उपमाओं की बेलें सूखी, बिंब भी सूझते नहीं मन में।
दर्द और आँसू से व्यथित हुई,
कविता के सूनेपन में।।
निर्झरिणी सी बहती धार नदी की,
फिर भी भावनाएँ सुप्त क्यों?
ऊँचे-ऊँचे हिम शिखर मालाएँ,
लगते शब्दकोष सूखे क्यों?
छंद राग तड़पते मन के अंदर,
लय साधना क्यों रूठ गई?
सुर सरगम भी बाधित हो रहे,
भाव तन्मयता क्यों छूट गई?
हर शब्द लगे क्यों बिखरे-बिखरे,
मन क्यों प्रेरणा विहीन हुआ?
ज्ञान दीप करना प्रज्ज्वलित माँ,
जाने क्यों अन्तस दिशा विहीन हुआ??
शब्दों के बिखरे मोतो को,
फिर से कागज़ पर उकेर पाऊँ मैं।
देना ये वरदान विमला वरप्रदा,
तेरे स्वागत में सुरमय गीत सजाऊँ मैं।।
अंजलि किशोर”कृति”