आंगन बुलाता है – मधु गुप्ता

आंगन बुलाता है

विधा-कविता

खाली जेबें भरने की खातिर ,यह परदेश हमें रिझाता है।

हृदय का कोना आज भी कहता,घर का आंगन हमें बुलाता है।।

 

बीती हुई यादों का खजाना,आंखों में रह रह कर हलचल मचाता है।

वह आंगन का चूल्हा मां,न जाने क्या-क्या याद दिलाता है।।

 

घर आंगन सब पास में है फिर भी कुछ छूटा सा लगता है।

जिसमें बैठकर करें इंतजार मां,वह आंगन आवाज लगता है ।।

 

आते जाते मुसाफिरों से,हृदय इतना ही पूछना चाहता है।

मेरे घर के आंगन का हिस्सा क्या आज भी कहीं सिसकता है।।

 

भरी हुई जेबों में तो,खोई हुई खुशियों का मंजर छुपा रहता है।

लाख छुपाएं आंसू फिर भी,त्योहारों का मौसम बहुत रुलाता है।।

 

लम्बी हो गई सड़के रिश्तों की, यह देख के मन घबराता है।

मां बाप की प्यासी आंखों का ज्वर, हर पल बहुत सताता है।।

मधु गुप्ता “अपराजिता”