🌿 “करो वादा…” — एक बेटे की आवाज़ में
(बदलते समय, भटकते रास्तों और माता-पिता की मजबूती पर आधारित)
करो वादा… कि मेरा हाथ थामे रहोगे तुम,
ज़िंदगी की हर धूप–छाँव में मेरे साथ खड़े रहोगे तुम।
आज मैं घर छोड़कर दूर पढ़ने जा रहा हूँ,
माँ–पापा… सच कहूँ तो सबसे ज़्यादा डर भी आपसे दूर होने का ही लग रहा हूँ।
हॉस्टल की राहों में हर चेहरा मेरे लिए अनजाना सा है,
पर आपकी बातें याद आते ही दिल को थोड़ा सा सहारा मिल जाता है।
दुनिया की भीड़ में अच्छे–बुरे सब ही मिल जाते हैं,
कभी रास्ते भटकाते हैं, कभी मन को उलझा जाते हैं।
अगर कभी मैं बातों में पहले-सा न रहूँ,
या बेवजह चुप चुप सा दिखूँ…
तो पापा… समझ जाना,
कि शायद कहीं कोई गलती, कोई डर, कोई दबाव—
मुझे खुद से दूर कर रहा है।
मैं जानता हूँ—समय की आँधी कभी-कभी बच्चों को जकड़ लेती है,
पर माता-पिता का विश्वास ही है जो उन्हें वापस सही राह पर ले आता है।
थक जाऊँ अगर सपनों और डर के बीच झूलते-झूलते,
तो क्या आप अपनी वही पुरानी ताकत बनकर मुझे फिर सम्भाल लोगे चुपके-चुपके?
क्योंकि मैं चाहे जितना बड़ा हो जाऊँ,
दुनिया चाहे जितनी भी बड़ी क्यों न हो—
आप ही मेरी असली ढाल हो, मेरी सच्ची दिशा, मेरा सुरक्षित घर हो।
इस नए सफ़र में बस इतना वादा कर दो आज—
कि गलती करूँ तो डाँटना… पर छोड़ना मत,
भटक जाऊँ तो समझाना… पर दूरी बनाना मत।
और माँ–पापा… आप भी वादा करो—
कि जैसा मैं छोटा था, वैसा ही आज भी हूँ…
मुझे आपकी ज़रूरत अब भी उतनी है,
बस मेरे बोलने का तरीका बदल गया है।
क्योंकि बेटा हो या बेटी—
हम कभी दूर नहीं जाते,
बस ज़िंदगी हमें थोड़ा-सा उलझा देती है…
और माता-पिता की मुस्कान ही हमें वापस घर ले आती है।
ज्योती कुमारी
नवादा (बिहार)