अयोध्या। राम मंदिर के निर्माण और रामलला के दिव्य दर्शन की शुरुआत के बाद देशभर में उत्साह और संतोष का माहौल है। लंबे संघर्ष और प्रतीक्षा के बाद भव्य मंदिर का निर्माण पूर्ण होना एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। लेकिन इसी के साथ समाज में एक नई चर्चा भी तेज हो गई है—अब आगे क्या? मंदिर बनने के बाद समाज का लक्ष्य क्या होना चाहिए?
तपस्वी छावनी पीठाधीश्वर के उत्तराधिकारी राजश्री महंत एकनाथ महाराज ने स्पष्ट कहा है कि राम मंदिर संघर्ष का अंत था, किसी नए विवाद की शुरुआत नहीं। उन्होंने कहा कि अब समय राम चरित्र निर्माण का है। समाज को शांत, संयमित और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाने की आवश्यकता है, न कि अनावश्यक उत्तेजना फैलाने की।
मंदिर निर्माण के बाद भी “हिंदू खतरे में है” जैसे नारों पर सवाल उठते हुए महंत महाराज ने कहा कि राम मंदिर किसी संस्था की निजी संपत्ति नहीं, पूरे देश और समाज का गौरव है। उनके अनुसार, जब रामलला विराजमान हो चुके हैं तो भय और भ्रम फैलाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। अब समाज को जोड़ने और दिशा देने की आवश्यकता है, न कि विवाद बढ़ाने की।
धार्मिक चिंतकों का मानना है कि भगवान राम ने समाज को भाषण नहीं, आदर्श दिए। राम की मर्यादा सेवा, त्याग, न्याय और विनम्रता पर आधारित थी। लेकिन आज कई मंचों पर उत्तेजना और विभाजनकारी भाषा का बढ़ना चिंता का विषय है। समाज सवाल कर रहा है कि जब राम शांत हैं, तो शोर कौन मचा रहा है?
महंत एकनाथ महाराज ने कहा कि मंदिर बनने के बाद अब देश की प्राथमिकताएँ स्पष्ट होनी चाहिए। उन्होंने शिक्षा, रोजगार, विज्ञान, तकनीक और युवाओं के अवसरों को वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत बताया। उनका कहना है कि मंदिर आस्था का केंद्र है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य शिक्षा, सभ्यता और चरित्र से निर्मित होता है।
विभाजनकारी नारों और मंचों पर उकसावे की भाषा को लेकर महंत महाराज ने धार्मिक नेतृत्व को भी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अब धर्म का व्यापार बंद होना चाहिए और सेवा को प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि समाज को दिशा नहीं दे सकते तो मंच छोड़ देना ही उचित है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राम राज्य नफरत या भीड़ के शोर से नहीं, बल्कि चरित्र, न्याय और आदर्शों से स्थापित होता है। राम मंदिर के निर्माण के बाद अब समय सामाजिक सुधार और राम के चरित्र को अपने जीवन में उतारने का है।
समग्र रूप से संदेश यही है कि मंदिर बन चुका है, अब राम चरित्र निर्माण की आवश्यकता है। समाज को जोड़ना, शिक्षित करना और मजबूत करना ही आगे का मार्ग है। धर्म का अर्थ सेवा है, व्यापार नहीं।