हमें थोड़ा सताना चाहिए था।

तुम्हे नज़रे चुराना चाहिए था,
हमें थोड़ा सताना चाहिए था।

बला की भीड़ थी इक साथ मेरे,
तुम्हें भी साथ आना चाहिए था।

हवस कोठी,हवेली की किसे थी,
मुझे तो इक ठिकाना चाहिए था।

हमारे क़त्ल पे क्यों आँख नम है,
तुम्हें तो खिलखिलाना चाहिए था।

फ़ज़ा की खुश्की थोड़ी कम तो होती,
हवा में कुछ उड़ाना चाहिए था।

चलो हम पर बहुत पाबंदियां थी,
तुम्हें तो आना जाना चाहिए था।

बढ़ाना ही अगर था कद को अपने,
हमारा क़द घटाना चाहिए था।

बहुत रुसवा हुआ मैं उस की ख़ातिर,
मुझे उस को बताना चाहिए था।

नदीम अब भूल भी जाओ उसे तुम,
उसे ऊँचा घराना चाहिए था।

नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर।।