मृत्यु: जीवन का एकमात्र अटल सत्य

✍️ नेहा वार्ष्णेय

दुर्ग छत्तीसगढ़

 

हाल ही में एक काव्य गोष्ठी में मुझे बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया गया। जहाँ सभी कविगण देशभक्ति, प्रकृति और माता-पिता जैसे भावनात्मक विषयों पर काव्यपाठ कर रहे थे, वहीं मैंने मंच पर एक बिल्कुल अलग और कम चर्चित विषय को उठाया — “मृत्यु”।

 

मृत्यु, एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही लोगों की आँखों में भय उतर आता है। एक ऐसा सत्य जिसे हम सब जानते तो हैं, पर स्वीकार नहीं करना चाहते। शायद यही कारण है कि समाज में मृत्यु पर बात करना आज भी वर्जित माना जाता है। लेकिन मुझे लगा, जब हम जीवन का उत्सव मना सकते हैं, तो मृत्यु से क्यों भागें?

 

मैंने मंच से यही प्रश्न किया — “क्या मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा सत्य नहीं है?”

 

जीवन तो हमें मिल चुका है, हम उसे जी ही रहे हैं। लेकिन वह क्षण जब यह जीवन समाप्त होगा, वह एकमात्र निश्चित बात है — मृत्यु ही है जो शाश्वत है।

 

जब मैंने गरुड़ पुराण का श्रवण किया, तो मैंने महसूस किया कि मृत्यु के प्रति भय नहीं, बल्कि जागरूकता और तैयारी होनी चाहिए। मृत्यु कोई भयावह अंत नहीं, बल्कि आत्मा की एक नई यात्रा की शुरुआत है। और जब हम इसे समझ जाते हैं, तो जीवन और भी सुंदर लगने लगता है।

 

हम अपने जीवन की हर छोटी-बड़ी योजना बनाते हैं — स्कूल, करियर, विवाह, निवेश, यात्रा — लेकिन कभी मृत्यु के बाद की योजना नहीं बनाते। क्यों? क्योंकि हम मान ही नहीं पाते कि हमारा समय सीमित है।

 

आजकल अचानक मृत्यु आम हो गई है — रोड एक्सीडेंट, साइलेंट हार्ट अटैक, और न जाने क्या-क्या। ऐसे में क्या यह जरूरी नहीं कि हम मानसिक रूप से तैयार रहें?

 

क्या आपने कभी यह सोचा है कि अंतिम समय में आप किनके साथ रहना चाहेंगे? क्या आपकी वसीयत तैयार है? क्या आपके परिवार को आपके जरूरी पासवर्ड, निवेश और बैंक जानकारी की खबर है?

 

मैं मानती हूं कि यह विषय युवावस्था से ही चर्चा में लाया जाना चाहिए।

ऐसे कोई अपने को चुनें जो आपके निर्णयों को समझे, आपके प्रति संवेदनशील हो, और कठिन समय में भी व्यावहारिक निर्णय ले सके।

 

मृत्यु पर चर्चा कोई अशुभ विचार नहीं है, बल्कि यह जीवन को गहराई से समझने और उसे पूर्णता से जीने का निमंत्रण है।

 

और अंत में मैं बस इतना ही कहूँगी —

हर दिन को भगवान का प्रसाद समझकर जियें। अपनों से प्रेम करें, सेवा करें, और नाम-स्मरण करें।

क्योंकि कलयुग में केवल प्रभु का नाम ही हमारे उद्धार का माध्यम है —

“कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरे पारा।”

 

तो चलिए, मृत्यु से भागे नहीं, उसे समझें —

क्योंकि यही समझ हमें जीवन का सबसे सुन्दर रूप दिखा सकती है।