मदिर फागुनी राग – गोपाल त्रिपाठी

“”मदिर फागुनी राग””

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पाती भेजी प्रणय की,

वासंती अनुराग।

आम्र मंजरी खेलती,

मत्त सुआ संग फाग ।।1।।

चितवन रतनारी हुई,

सुर्ख हो गए गाल।

सरसों गदराई फिरे,

टेसू मालामाल।।2।।

कुहू कुहू बगिया करे ,

मलयज गंध समीर।

महुए का रस चू रहा,

भींगे खंजन ,कीर ।।3।।

पायल अंगड़ाई हुई,

आहट पर बेजार।

हौले हौले फेंकती,

कचनारी रसधार।।4।।

अठखेली फागुन करे,

अंग हुआ सतरंग।

पीतांबर धरती रंगी,

मन मदमाती भंग ।।5।।

चुटकी लेती है ननद,

भौजाई के ठौर।

मुंह मीठा जल्दी करा,

लगे आम अब बौर।।6।।

गुलमोहर इतरा रहा,

दहका सुमन ,पलाश ।

अमलतास है छेड़ता ,

बौराया आकाश ।।7।।

घूंघटा तोड़े रश्मिंया,

नैनों के अनुबंध ।

फागुन छिप छिप बन रहे,

नित नूतन संबंध ।।8।।

मदिर आम की बाग है,

मदिर फागुनी राग ।

कान्हा मन बहका दिया,

राधा का अनुराग।।9।।

 

गोपाल त्रिपाठी

शांतिपुरम

प्रयागराज

9889609950

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