🌹 *ओ३म्*🌹
📚 ईश्वरीय वाणी वेद 📚
*सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि व;।*
*अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्नया ।*
।। अथर्ववेद ३/३०/१।।
🌻🌻 *मंत्रार्थ*🌻🌻
मैं 🌼 व: = तुमको 🌼 सहृदयम् = हृदय वाला 🌼 सांमनस्यम् = मनवाला और 🌼 अविद्वेषम् = द्वेष रहित 🌼 कृणोमि = बनाता हूं। 🌼 अन्य: = एक मनुष्य 🌼 अन्यम् = दूसरे मनुष्य के साथ 🌼 अभिहर्यत = ऐसा व्यवहार करें 🌼 इव = जैसे 🌼 अघ्नया = गाय 🌼 जातम् = नव – उत्पन्न 🌼 वत्सम् = बछड़े के साथ करती है!
🥝 *मंत्र की समीक्षा*🥝
वेद में उपदेश देने की तीन शैलियां हैं।(१) ईश्वर की ओर से मनुष्यों को उपदेश दिया जाता है। (२) आचार्यों की और से शिष्यों को।(३) उपदेशकों की ओर से श्रोताओं को उपदेश दिया जाता है। मंत्र में *कृणोमि* पद का अर्थ बनता है कि मनुष्य कैसे -कैसे जीवन में व्यवहार करें!
उसका समाधान दिया है कि 🪷 *सहृदयम=* उदार हृदय वाले 🪷 *सांमनस्यम्=* दिव्य मस्तिष्क वाले 🪷 *अविद्वेषम्=* द्वेष न करने वाले बनें।एक आदर्श मनुष्य के यही मुख्य लक्षण हैं।
*हृदय* प्रतीक है प्रेम का। *मन* या विचार प्रतीक है बुद्धि का। *अविद्वेष* प्रतीक है विश्वहित की। हृदय में प्रेम हो और बुद्धि न हो तो विश्वहित में बाधा पड़ती है इसीलिए कहावत बन गई। *नादान मित्र से दानेदार शत्रु अच्छा*। जिसमें बुद्धि न हो ऐसा दोस्त अपने लिए भी हानिकारक होता है और दूसरों के लिए भी।
*अन्यो अन्यमभि हर्यत* वेद भगवान कहते हैं कि एक को दूसरे के साथ बिना किसी 🌾 स्वार्थ और विशेषता 🌾 के भी अच्छा व्यवहार करना चाहिए।
अंतिम पद है। *वत्सं जातं इव अघ्नया* हम सभी गाय का दूध पीते हैं, इसीलिए हमारे मन में वही प्रेम उत्पन्न हो जाता है जो माता के लिए होना चाहिए माता अघ्नया अर्थात् पूज्या है। *गोमाता* कहती है बच्चे की दो प्रमुख आवश्यकता है 🐂 पहला स्नान दूसरा भोजन 🐂 स्नान पहला कर्म और भोजन दूसरा।गंदी बोतल में शुद्ध दूध डालने से दूध भी मैला हो जाता है। अतः केवल अपनी अपनी ही नहीं दूसरों की शुद्धि का भी ध्यान रखना चाहिए। गाय पशु है वह केवल शरीर की शुद्धि अपने बछड़े की करती है परंतु मानव वहीं है जो *शरीर,वाणी,मन* तीनों की शुद्धि नियमित करे। गौ-माता का दृष्टांत हुमको यह शिक्षा देता है कि अपने *सम्पर्क* में आने वाले मनुष्यों की शारीरिक, मानसिक,तथा सामाजिक शुद्धि का विचार रक्खे। नवजात बछड़ा अछूत है — छूने योग्य नहीं,मैला है, गंदा है।गाय ने चाट -चाटकर उसको। *अस्पृश्य से स्पृश्य* बना दिया।इसी प्रकार हमारा कर्तव्य है कि जितनी निम्न जातियां हैं, जो वस्तुत: अस्पृश्य हैं उनको स्पृश्य बना दें परंतु हमारा उनके साथ ऐसा व्यवहार है कि उनकी *अस्पृश्यता* अधिक हो जाती है।आज भारत की राजनीति में जो *अस्थिरता* है यही मुख्य कारण है सारी राजनीतिक पार्टियां इसी को अपना *ओट बैंक* बनाती है। यदि हमने 📚 ईश्वरीय वाणी वेद 📚 को पढ़ लिया होता।समझ लिया होता।आचरण कर लिया होता तो आज सारा विश्व भारत में ओतप्रोत होता।
आचार्य सुरेश जोशी
*वैदिक प्रवक्ता*