शिवरात्रि है बोध रात्रि -आचार्य सुरेश जोशी

🪷 शिवरात्रि है बोध रात्रि🪷
१९ वीं शताब्दी में भारत सत्य सनातन वैदिक संस्कृति नष्ट हो चुकी थी। भारत अनेक मत,पंथ, संप्रदायों का केंद्र बन गया था। विक्रम संवत १९०३ में मात्र २१ वर्ष की आयु में 🌴मूल शंकर 🌴नामक युवक को सत्य को जानने की प्रबल जिज्ञासा जाग उठी और गृह त्याग कर दिया। इधर उधर भ्रमण करते हुए २४ वर्ष की आयु में स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से संन्यास लेकर 🌲दयानंद सरस्वती🌲 नाम से प्रसिद्ध हुए। पुनः अनेक हिमालय के योगियों के संपर्क में आकर योग विद्या में पारंगत हुए । फिर भी यथार्थ ज्ञान नहीं मिल पाया।१४ नवंबर १८६० में दंडी स्वामी 🚩गुरु विरजा नन्द 🚩की कुटिया मथुरा में पधारे। मात्र ढाई वर्ष में गुरुभक्ति🧘 ब्रह्मचर्य🧘 व तप द्वारा आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन कर दीक्षित हुए। उस सत्य ज्ञान को अपना अश्त्र बनाकर समरभूमि में वैदिक ध्वज फहराने निकल पड़े।जिन चुनौतियों का उन्होंने सामना किया वो इस प्रकार थी।
🌻 आत्मा -परमात्मा भ्रम🌻
एक ओर नास्तिक कहते थे हम आत्मा को मानते हैं मगर परमात्मा को नहीं मानते । दूसरी ओर आचार्य शंकर के नवीन वेदांती कहते थे 🌴 अहं ब्रह्मास्मि 🌴 अर्थात् हम ही ईश्वर हैं।
🌹 महर्षि उवाच 🌹
तब स्वामी दयानंद कहते हैं जिसको दोनों मानते हैं वहीं सत्य है अर्थात परमात्मा की भी सत्ता है।आत्मा की भी सत्ता है।आत्मा हमारा स्वरूप में परमात्मा हमारा लक्ष्य है। ईश्वर,जीव, प्रकृति तीन अनादि सत्ताएं हैं।
🌻 शरीर आत्मा भ्रम 🌻
न ई सभ्यता के लोग भौतिक विज्ञान के आविष्कारों की चका चौध से प्रभावित होकर कहने लगे संसार मौज मस्ती के लिए बना है।खाओ -पीओ मौज करो।मरने के बाद कोई लोक -परलोक नहीं है। दूसरी ओर महात्मा बुद्ध व महाबीर जैंसे दार्शनिक शरीर व संसार की उपेक्षा कर शरीर को सुखाना ही धर्म समझ बैठे थे।
🌹 महर्षि उवाच 🌹
महर्षि दयानंद ने समझाया कि अति सर्वत्र वर्जयेत्।शरीर रथ है। इंद्रियां घोड़े हैं।मन लगाम है। बुद्धि सारथी है।आत्मा रथी है । परमात्मा अंतिम बिंदु है। शरीर का भोजन धर्मा नुचरण और आत्मा का भोजन सत्संग है। त्याग पूर्वक जीना ही जीने की कला है।
🌻 स्त्री पुरुष भ्रम 🌻
१९ वीं शताब्दी में नारी शक्ति केवल भोग की वस्तु बन चुकी थी।चक्की व चूल्हे तक ही उसका जीवन सिमट चुका था। नारी नर्क का द्वार है।पति के मरने पर उसे जीते जी सती होना अनिवार्य है ऐसे उपदेश होते थे।
🌹 महर्षि उवाच 🌹
महर्षि दयानंद संपूर्ण जीवन आदित्य ब्रह्मचारी रहे। स्त्री से स्वयं दूर रहें मगर उन्होंने स्त्री को माता कहकर सम्मान दिया।बाल विवाह रोका।विधवा विवाह प्रारंभ किए। शिक्षा के द्वार खोल नारी को राष्ट्रीय धारा से जोड़ा ।जिसके परिणामस्वरूप आज नारी पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष में काम कर रही है।
🌻 भेद-भाव का भ्रम 🌻
जाति वाद।छुआ -छूत चरं सीमा पर था।वर्ण व्यवस्था तथाकथित जाति व्यवस्था बन चुकी थी।
🌹 महर्षि उवाच 🌹
स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने कहा जाति केवल एक है वह है मानव जाति। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जाति नहीं वर्ण हैं।वर्ण का अर्थ होता है योग्यता।गोरा वह है जिसका हृदय साफ है और विचार पवित्र हैं।राम व कृष्ण जी दोनों काले थे। अशिक्षित शूद्र है और शिक्षित ही ब्राह्मण है।
🌻 पूजा-पाठ का भ्रम🌻
ईश्वर स्तुति, प्रार्थना, उपासना का स्थान मूर्ति पूजा, पेड़ पूजा, नदी, तालाबों में स्नान व तीर्थों में घूमना ही पूजा पाठ कहा जाने लगा। गुरु पूजा। पुस्तक पूजा।कब्र पूजा में मानव जाति आकंठ डूबी हुई थी। ईश्वर के ध्यान की जगह रामलीला, कृष्ण लीला,कब्बाली, मुशायरा ही कर्मकांड हो चुका था।
🌹 महर्षि उवाच 🌹
महर्षि दयानंद जी ने इस समस्या का समाधान एकमात्र शास्त्रार्थ समझा और २२ अक्टूबर १८६९ को स्वामी जी काशी में पधारें और काशी नरेश की अध्यक्षता में विशेष प्रसिद्ध शास्त्रार्थ हुआ। जहां सारी दुनिया को पता लगा कि ईश्वर एक है।वो निराकार है।उसकी पूजा नहीं स्तुति, प्रार्थना व उपासना होती है।वो किसी एक का नहीं मानव मात्र का है। परमात्मा मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा या मठ में नहीं रहता वह सर्वव्यापक और सर्वांतर्यामी है।
इस प्रकार व्यक्ति, परिवार, राष्ट्र व समाज में जहां जहां विकृतियां थी उसे महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने वेदों का प्रमाण देकर ठीक किया।
ईश्वर एक है। धर्म एक है वैदिक धर्म। धर्म ग्रंथ में वेद। भाषा एक है संस्कृत। ध्वज एक भगवा ध्वज। ईश्वर का मुख्य नाम एक है ओ३म्। अभिवादन एक ही नमस्ते।पूजा एक है यज्ञ। संसार के सभी मनुष्य आर्य हैं उन्हें संपूर्ण विश्व को आर्य बनाना है ऐसा संदेश देकर महर्षि दयानंद सरस्वती इस 🪷 शिवरात्रि को वोधरात्रि 🪷 बनाकर इस नश्वर संसार को आर्य समाज नामक संस्था के सहारे छोड़ कर मुक्ति की यात्रा पर निकल पड़े।हर आर्य समाजी का कर्तव्य है वो ऋषि के इन विचारों को आर्य समाज के माध्यम से जन -जन तक पहुंचाये।यही महर्षि दयानंद सरस्वती जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यही सार्थकता होगी 🌼 बोध रात्रि 🌼 की।
ये विचार आर्य समाज मंदिर विहारी पुर बरेली में ऋषि बोधोत्सव पर दिये गये।इस अवसर पर बाराबंकी से पधारी पंडिता रुक्मिणी जोशी 🌹 वैदिक भजनोपदेशिका 🌹 ने महर्षि दयानंद सरस्वती के प्रति अपने सुमधुर भजन से सबके अंदर ऋषि भक्ति जगाई। उनके भजन की पंक्तियां इस प्रकार थी।
शिव जी की नगरी को किसने आन हिलाया है।
कौन काशी में आया है? बड़ा तूफान मचाया है।यह भजन विडियो के रूप में संलग्न भी है।
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आचार्य सुरेश जोशी
🪴 वैदिक प्रवक्ता 🪴
🌴 वर्तमान कार्यकाल 🌴
आर्य समाज मंदिर विहारी पुर बरेली उत्तर प्रदेश ☎️ 7985414636☎️

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