शीर्षक – बगीचा भी मेरा वीरान नहीं होता

शीर्षक – बगीचा भी मेरा वीरान नहीं होता

जीवन में अगर कोहराम नहीं होता,

ज़माने में मैं भी बदनाम नहीं होता।

आंधियां गर अपना रुख मोड़ा न होता,

बगीचा भी मेरा वीरान नहीं होता।

 

इश्क गर उनसे बेपनाह नहीं होता,

दर्द यूं ही मेरा सरेआम नहीं होता।

सर्द महफ़िल में तेरा आना न होता,

भरी महफ़िल में मैं बदनाम नहीं होता।

 

निगाहें उनकी गर मयस्सर न होती,

क़त्ल मेरे प्यार का सरेआम नहीं होता।

पलट कर तूने यूं मुझे देखा न होता,

हंसी वादियों में यूं तूफान नहीं होता।

 

अस्क तूने अगर यूं बहाया न होता,

शायद हमें भी तुमसे प्यार नहीं होता।

प्यार तुमने अगर यूं सिखाया न होता,

प्यार में फिर से कत्लेआम नहीं होता।

साहित्यकार एवं लेखक –

आशीष मिश्र उर्वर

कादीपुर, सुल्तानपुर उ.प्र.

मो. 9043669462

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