महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की प्रसिद्ध रचना “राम की शक्ति-पूजा” में श्री राम का भीतरी युद्ध वास्तव में एक असाधारण वीर का परम साधक बनने का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक संघर्ष दर्शाया गया है। लंका का बाहरी युद्ध केवल एक पृष्ठभूमि है, जबकि असली और निर्णायक संघर्ष राम के अंतर्मन में घटित होता है। ईश्वर से संवेदनशील मनुष्य तक निराला की कविता में राम ईश्वर होते हुए भी पूर्णतः संवेदनशील मनुष्य के रूप में प्रस्तुत होते हैं। अधर्मी रावण को महाशक्ति (दुर्गा) का संरक्षण प्राप्त देखकर उनके मन में संशय और असुरक्षा उत्पन्न होती है कि क्या अधर्म की जीत होगी स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय, रह-रह उठता जगजीवन में रावण-जय-भय। राम अपने पुरुषार्थ और अस्त्र-शस्त्रों पर संदेह करने लगते हैं। उन्हें प्रतीत होता है कि उनका पराक्रम और धनुष इस अंधकार को मिटाने में असमर्थ हैं।यह रहा शक्ति का खेल समर शिल्प-विद्या-कुशल-रावण-हाथ-अमल कर्तव्य और प्रेम के बीच छटपटाहट यह युद्ध कर्तव्य और प्रेम के बीच भी है—एक ओर सीता की मुक्ति का संकल्प है, तो दूसरी ओर रावण के पक्ष में महाशक्ति का होना। इस विवशता में राम के अश्रु उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि न्यायप्रिय मनुष्य की भीतरी वेदना हैं।नयनो के डोरे लाल बहाते हुए अश्रु,अंजलि के पट से टूटे मानो दो मुक्ता प्रु चेतना का रूपांतरण
महर्षि अरविंद के ‘पूर्णयोग’ के अनुसार, राम का यह संघर्ष अंधकार से प्रकाश की ओर गमन है। अपनी मानवीय चेतना को दिव्य चेतना में बदलने के लिए उन्हें इस आंतरिक संघर्ष से गुजरना पड़ा। साधना और विजय जाम्बवान के परामर्श पर राम बाहरी युद्ध त्यागकर मौलिक शक्ति-पूजा और अंतर्मुखी साधना में लीन होते हैं।शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन, छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनंदन यह भीतरी युद्ध हर व्यक्ति के भीतर चलने वाले निराशा के अंधकार और अंतरात्मा के प्रकाश का प्रतीक है। इस आंतरिक संघर्ष को जीतकर ही श्री राम ‘वीर’ से ‘महासाधक’ और ‘विजेता’ बनते हैं।