हिंदी : आत्मगौरव, संस्कृति और भविष्य की भाषा
हिंदी को उत्सव तक सीमित न रखकर ज्ञान, तकनीक और जनसंवाद की सशक्त भाषा बनाने का आह्वान
लवकुश सिंह संवाददाता
अनुराग लक्ष्य न्यूज बस्ती
बस्ती। हिंदी दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय महासचिव, विश्व संवाद परिषद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ, भारत, प्रो. डॉ. नवीन सिंह (योगी) ने हिंदी को आत्मगौरव, संस्कृति और भविष्य की भाषा बताते हुए इसे ज्ञान, तकनीक, शोध और जनसंवाद की सशक्त भाषा बनाने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि किसी समाज की सोच, संवेदना, संस्कृति और सामूहिक स्मृतियों का आधार होती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में हिंदी ने विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और विचारों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किए जाने की स्मृति में हिंदी दिवस मनाया जाता है।
प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि हिंदी की सहजता और व्यापक स्वीकार्यता ने इसे साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, रंगमंच, सिनेमा और जनसंचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद और रामधारी सिंह दिनकर जैसे रचनाकारों ने हिंदी को जनभावनाओं और सामाजिक चेतना की प्रभावशाली अभिव्यक्ति बनाया।
उन्होंने कहा कि डिजिटल युग ने हिंदी के सामने नए अवसर खोले हैं। मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल पत्रकारिता के माध्यम से हिंदी सामग्री वैश्विक स्तर पर पहुंच रही है। आवश्यकता है कि हिंदी में विज्ञान, चिकित्सा, तकनीक, प्रशासन और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की गुणवत्तापूर्ण सामग्री विकसित की जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदी के प्रति प्रेम का अर्थ अन्य भारतीय भाषाओं का विरोध नहीं है। देश की सभी भाषाएं हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं। भाषाई विविधता का सम्मान करते हुए हिंदी को आगे बढ़ाना ही सच्ची भाषाई चेतना है।
उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि हिंदी दिवस को केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित न रखें, बल्कि दैनिक जीवन, चिंतन, लेखन और संवाद में सरल एवं प्रभावशाली हिंदी का प्रयोग बढ़ाएं। यही हिंदी के प्रति वास्तविक सम्मान और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी होगी।