ग़ज़ल
निगाहों से ही केवल बोलता है
नज़र से भेद सबके खोलता है
न चेह्रे को करो मायूस अपने
हरिक दरपन कहाँ सच बोलता है
तुम अपने हुस्न पर परदा गिरा दो
रगों में इक नशा-सा घोलता है
तुम्हारा ज़िक्र और बातें तुम्हारी
कोई कानों में ज्यूँ रस घोलता है
ख़फ़ा हों क्यों हम अपने आईने से
जो दिखता है वही तो बोलता है
“किरन” करता है हर दिल पर हुकूमत
समझकर सोचकर जो बोलता है
-डॉ कविता ‘किरण’✍️