ग़ज़ल
मेरा ख़सारा हुआ लोगो की बधाई हुई,
मगर जनाब की भरपूर जगहंसाई हुई।
वतन में अब कहीं जम्हुरियत नहीं दिखती,
पता करो ये ख़बर किस की है उड़ाई हुई।
उठा के आज का अखबार देखीये तो ज़रा,
हमारी दिल्ली है क्यों इतनी तिलमिलाई हुई।
कि देवबंद के नीचे भी इक शिवालय है,
किसी कमीन की है ये ख़बर उड़ाई हुई।
कि जिस को पाल के इतना बड़ा किया मैंने,
बिदाई होते ही बेटी मेरी पराई हुई।
जिसे मैं आज तलक मोतबर समझता था,
वो बात करने लगे हैं सुनी सुनाई हुई।
तबीब-ए-शहर से कहिये मतब को बंद करें,
दवाएं उनकी है ये सारी आज़माई हुई।
जो घर मैं पहुँचा ज़रा देर से तो ये देखा,
की दर पे माँ मेरी बैठी थी बौखलाई हुई।
विराजमान है जिस कुर्सी पे वो आज नदीम,
जो उसे ग़ौर से देखा तो है लजाई हुई।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर।।