ग़ज़ल
हक़ जो बोले उसे ग़द्दार न समझा जाये,
हम को बेबस मेरे सरदार न समझा जाये।
अपने ही दम से चेराग़ाँ है तुम्हारा मक़तल,
शहर से हम को तड़ीपार न समझा जाये।
बेच दो गुलशन-ए-सरसब्ज़,रहें हम चुपचाप,
हम को माउफ़ ऐ सरदार न समझा जाये।
ज़हन में अपने है महफ़ूज़ हर इक ज़ुल्म-ओ-सितम,
चुप अगर हम हैं तो बीमार न समझा जाये।
ख़ौफ़ से कैसे भला छोड़ दें हम अपना वतन,
ख़ुद को अब इतना असरदार न समझा जाये।
आज गर आ गये हैं मिस्र के बाज़ार में हम,
हम को यूसुफ़ का ख़रीदार न समझा जाये।
चाहने वाले हमारे भी हैं दुनिया में नदीम,
अब हमें उर्दू का अख़बार न समझा जाये।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥