खुमार उल्फ़त का उतरे कैसे, सुरूर बढ़ता ही जा रहा है, साहिल प्रतापगढ़ी,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 28 जून
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
ग़ज़ल के असली मायने ही अपने महबूब से बातें करना और उसकी दिलकशी में खो जाना। साहिल प्रतापगढ़ी इसी लब ओ लहजे के शायर भी हैं। इससे पहले भी आप साहिल को कई बार पढ़ चुके हैं। आज फिर उनकी एक ख़ास ग़ज़ल से आपको रूबरू करा रहा हूँ।
*१* – लहू कलेजे का रफ्ता रफ्ता मेरी नज़र से टपक रहा है,
तुम्हारी यादों में चुपके चुपके ये दिल जो तन्हा सिसक रहा है ।
*२* – तू अपने मयकश को थोड़ी-थोड़ी निगाह से ही पिला दे साकी,
तुम्हारी आंखों से पीने को दिल हमारा कितना हुमक रहा है ।
*३* – संभालें कैसे बताओ हमको हमारे सीने में मुद्दतों से,
तुम्हारा इश्क़ जो बन के शोला ठहर ठहर के दहक रहा है ।
*४* – तेरे तबस्सुम से कलियाॅं जलतीं तो चाॅंद बादल में मुॅंह छुपाये, तुम्हारे चेहरे का नूर जैसे फलक पे सूरज दमक रहा है ।
*५* – खुमार उल्फत का उतरे कैसे सुरूर बढ़ता ही जा रहा है,
तुम्हारी नज़रों की मयकशी है या जाम कोई छलक रहा है ।
*६* – मेरे तसव्वुर में तेरा चेहरा वो ख्वाब में तेरा आना जाना,
बताऊं कैसे मोहब्बतों में ये दिल भी मेरा ठुमक रहा है ।
*७* – मिली है जब से निगाह तुमसे नहीं है काबू में दिल हमारा,
ये जैसे मुट्ठी से रेत *साहिल* ज़रा ज़रा सा सरक रहा है ।
पेशकश,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी