ग़ज़ल
रखिये जो अपनी बात,तो थोड़ा संभाल कर,
करिये न कोइ फैसला सिक्का उछाल कर।
इक बेवफ़ा से तर्क-ए-तअल्लुक़ पे ये मलाल,
कमबख़्त अपने क़द का तो थोड़ा ख्याल कर।
मुंह खुल गया जो मेरा तो पछताएगा बहुत,
कम्बख़्त इसलिए न तू मुझ से सवाल कर।
छँट जाएगी मिलते ही सभी बदगुमानियाँ,
इक बार आ कि मिलिए तो मौक़ा निकाल कर।
इस में है तेरा फ़ायदा,क्यों मानता नहीं,
पछतायेगा बहुत मेरी तजवीज़ टाल कर।
कैसे बताऊँ कितनी फँसी उस में मछलियाँ,
लौटा हूँ मैं अभी अभी तो जाल डाल कर।
करतब का तेरे मुझ पे असर कुछ नहीं नदीम,
कुछ और ढूँढ,ला नया जंतर निकल कर।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥