शीर्षक: “बरगद का पेड़”
गाँव के बीचों-बीच एक विशाल बरगद का पेड़ था। उसकी जटाएँ ज़मीन को छूतीं, मानो धरती को गले लगा रही हों। गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे—“यह पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं, हमारी पीढ़ियों का साक्षी है।”
हर दिन बच्चे उसकी छाँव में खेलते, किसान दोपहर में वहीं बैठकर रोटी खाते, और बुज़ुर्ग अपनी यादों की गठरी खोलकर घंटों बातें करते।
एक दिन शहर से पढ़कर आया रवि बोला,
“इस पुराने पेड़ को काट देते हैं। यहाँ मार्केट बन जाएगा, गाँव तरक्की करेगा।”
कुछ लोग उसकी बातों में आ गए। सबको लगा—सच में, पेड़ से क्या फायदा?
अगले ही दिन पेड़ काटने की तैयारी होने लगी। कुल्हाड़ी उठी ही थी कि पास बैठी दादी माँ बोलीं,
“पहले मेरी बात सुन लो।”
सब रुक गए।
दादी ने कहा,
“जब इस गाँव में अकाल पड़ा था, तब इसी पेड़ की छाँव में लोगों ने मिलकर अनाज बाँटा था। जब बाढ़ आई थी, लोग इसकी शाखाओं पर चढ़कर अपनी जान बचाई थी। जब कोई अकेला होता है, यही पेड़ उसका साथी बनता है।”
रवि थोड़ा रुका, पर बोला,
“पर इससे आज क्या फायदा?”
दादी मुस्कुराईं,
“बेटा, जो सिर्फ अपना फायदा देखे, वो इंसान नहीं व्यापारी होता है। और जो सबका सहारा बने, वही सच्चा जीवन जीता है—जैसे ये बरगद।”
इतना सुनते ही गाँव के एक बच्चे ने कहा,
“अगर पेड़ नहीं रहेगा, तो हम कहाँ खेलेंगे?”
किसान बोला,
“और हम दोपहर में कहाँ बैठेंगे?”
धीरे-धीरे सबको एहसास हुआ—बरगद सिर्फ पेड़ नहीं, गाँव की आत्मा है।
रवि ने चुपचाप कुल्हाड़ी नीचे रख दी।
उस दिन फैसला हुआ—पेड़ नहीं कटेगा, बल्कि उसके आसपास साफ-सफाई और सजावट की जाएगी।
कुछ ही महीनों में वही जगह गाँव का सबसे सुंदर चौक बन गई। लोग दूर-दूर से उस बरगद को देखने आने लगे।
रवि ने दादी से कहा,
“मैंने तरक्की का मतलब गलत समझ लिया था।”
दादी बोलीं,
“बेटा, असली तरक्की वो है, जिसमें प्रकृति और इंसान दोनों साथ बढ़ें।”
शिक्षा:
जो हमें जीवनभर सहारा दे, उसे कभी नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए। सच्ची प्रगति वही है, जो प्रकृति और समाज दोनों के हित में हो।
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़