थाइराइड: बढ़ता स्वास्थ्य संकट और प्राकृतिक उपचार की राह – डॉ नवीन योगी
बस्ती। आधुनिक जीवनशैली, बढ़ता मानसिक तनाव, अनियमित दिनचर्या और असंतुलित खान-पान के कारण थाइराइड रोग तेजी से फैलता जा रहा है। चिकित्सकों के अनुसार यह अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में भी बड़ी संख्या में लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं। विशेष रूप से महिलाओं में यह समस्या अधिक देखने को मिल रही है, खासकर रजोनिवृत्ति, गर्भावस्था और यौवनारंभ के दौर में।
थाइराइड ग्रंथि शरीर के चयापचय (मेटाबॉलिज्म) को नियंत्रित करती है। जब यह संतुलन बिगड़ता है तो दो प्रमुख विकार जन्म लेते हैं—हाइपरथाइरॉइडिज्म और हाइपोथाइरॉइडिज्म। हाइपरथाइरॉइडिज्म में व्यक्ति का वजन तेजी से घटता है, घबराहट होती है, अधिक पसीना आता है और हृदय गति बढ़ जाती है। वहीं हाइपोथाइरॉइडिज्म में वजन बढ़ना, ठंड लगना, कब्ज, थकान और जोड़ों में अकड़न जैसी समस्याएं सामने आती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आयोडीन की कमी भी थाइराइड से जुड़े घेंघा (गलगंड) रोग का बड़ा कारण बन रही है।
संकल्प चैरिटेबल ट्रस्ट के निदेशक एवं प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ प्रो. डॉ. नवीन योगी के अनुसार, दवाओं के साथ-साथ प्राकृतिक चिकित्सा अपनाकर इस रोग में उल्लेखनीय सुधार संभव है। वे कहते हैं कि ताजे फलों का रस, अंकुरित आहार, हरी सब्जियां, सिंघाड़ा, मखाना और आयोडीन युक्त नमक का सेवन लाभकारी होता है। सप्ताह में दो दिन फलाहार उपवास, एनिमा, मिट्टी की पट्टी, उदरस्नान तथा पालक-शहद-जीरा का मिश्रण भी शरीर को संतुलन में लाने में मदद करता है।
योग के माध्यम से भी थाइराइड को नियंत्रित किया जा सकता है। मत्स्यासन, पवनमुक्तासन, भस्त्रिका एवं अनुलोम-विलोम प्राणायाम और योगनिद्रा नियमित करने की सलाह दी जाती है। साथ ही पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन और नियमित दिनचर्या को अपनाना अनिवार्य बताया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते जांच और सही जीवनशैली अपनाकर थाइराइड को नियंत्रित रखा जा सकता है।