शीर्षक: अनकहे शब्द
दिनांक: २३-०१-२०२६
आज कुछ लिखा है मैंने,
क्या लिखा है… पता नहीं।
ऊपर तो बस स्याही दिख रही,
पर अंदर की गहराई का पता नहीं।
क्या मेरे इन सवालों का जवाब है?
जी हुज़ूर! आज कुछ लिखा है मैंने।
परखोगे… तो बहुत बुरी हूँ मैं,
समझोगे… तो मेरे जैसी मिलेगी भी नहीं।
भावनाएं मेरी, करें मुझे निशब्द,
तब खोलूँ मैं शब्दों का पिटारा।
दिखता जैसे झिलमिल सितारा,
हृदय की वेदना कहती है—
“अब सजा ले इन्हें काग़ज़ पर ऐ ज्योति,
उनसे… जिनसे अब बात नहीं होती।”
आज फिर कुछ लिखा है मैंने,
कई सदियों के बाद…
फिर वही सवाल,
वही पुराने सवाल।
— कवयित्री ज्योति वर्णवाल नवादा (बिहार)