अपने नाम को सार्थक करता काव्य संग्रह – हमने देखा एक ज़माना 

पुस्तक समीक्षा

अपने नाम को सार्थक करता काव्य संग्रह – हमने देखा एक ज़माना

 

समीक्षक- सुधीर श्रीवास्तव

 

‘हमने देखा एक ज़माना’ कवयित्री रुपा माला के जीवन के विविध आयामों से संचित अनुभवों के साथ यथार्थबोध का आइना, सामाजिकता, संवेदनाओं की सरल, सहजता को परिलक्षित अनुभूतियों की शब्द चित्र सरीखा है।

111 कविताओं वाले संग्रह की रचनाओं में विषयों की विविधता, व्यापकता, दूरदृष्टि का ईमानदार प्रयास है। जिसमें समाज, प्रेम, पीड़ा, संघर्ष, स्मृतियाँ, सामाजिक परिवेश, मानवीय संबंध और आत्म-विश्वास के साथ विकास की चेतन यात्रा को महसूस किया जा सकता है। सरल, सरस और प्रवाहपूर्ण शैली पाठकों को सहज ही अपनी ओर आकृष्ट करती है।

सामान्यतया हम भले ही स्वीकार/अस्वीकार्य करें, परंतु हर किसी के जीवन में ऐसे लोगों का योगदान/प्रेरणा/प्रोत्साहन/संबल निश्चित ही होता है जो उसे विशेष बनाने में प्रभावी भूमिका निभाता ही है।अब यह संबंधित पर निर्भर करता है कि वो उसे कितना सकारात्मक/नकारात्मक ढंग से लेकर अपने में उतारता है। साहित्य सृजन का शुभारंभ भले ही हममें से अधिकांश ने शौकिया तौर पर शुरू किया हो। लेकिन उसे आगे बढ़ाने में बहुत सारे लोगों का किसी न किसी रूप में कम/ज्यादा योगदान होता ही है। प्रारंभिक स्तर पर यदि परिवार के सदस्यों का प्रोत्साहन, सहयोग, संबल मिला जाता है,तो ये सोने में सुहागा जैसा सिद्ध हो सकता है। रुपा जी ने इसे सहर्ष स्वीकार भी किया है कि उनकी इस सृजन यात्रा में उनके जीवन साथी का अमूल्य सहयोग है। जिनके विश्वास, सहयोग और प्रेरणा ने उनकी लेखनी को दिशा दी। एक रचनाकार के नाते मैं विश्वास से कह सकता हूँ कि प्रस्तुत काव्य संग्रह के मूर्तरूप में आने के पीछे उनकी प्रेरणा/संबल और आत्मविश्वास का, पार्श्व में ही सही मुख्य भूमिका है।

प्रियंका झा के शब्दों में – रुपा माला की लेखनी में सहजता, गहराई और भावनात्मक प्रवाह का अद्भुत संगम है।

वरिष्ठ गीतकार पुनीत माथुर ‘परवाज’ महसूस करते हैं कि रुपा जी की कविताएं अपने आसपास को, स्त्री को, प्रेम को विविध कोणों से देखती हैं। आपकी दृष्टि व्यापक है। स्त्री जीवन की विडंबनाओं पर आपकी पैनी नजर है।

उच्च न्यायालय रांची के अधिवक्ता एल. के. सिन्हा के अनुसार रुपा माला ‘विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी उन्होंने शब्दों के माध्यम से अपनी आत्मा की गूँज की अभिव्यक्ति की है।

सेवानिवृत्त बैंकर पशुपति प्रसाद कहते हैं कि रुपा जी यह सृजन किसी प्रसव पीड़ा से कम नहीं, क्योंकि कवयित्री स्वयं ही व्यक्ति की कोमल शिशु प्रतिमा हैं।

 

संग्रह की शुरुआत गणेश वंदना से हुई है। हाइकु विधा में एक हाइकु अवलोकनार्थ रखता हूं –

बुद्धि के दाता

आप ही हैं विधाता,

प्रथम पूज्य।

 

खामोशी को परिभाषित करती ‘खामोशियां’ कविता की ये पंक्तियां काफी कुछ अपने बारे में स्वयं बोलती प्रतीत होती हैं –

खामोशी की भाषा

सहज होती परिभाषा,

जिनके अंदर हों खामोश

कह देती निगाहें सारे राज।

 

भीगी पलकों का मार्मिक शब्द चित्र खींचते हुए कवयित्री लिखती है –

बातों की कड़ुवाहट,

अकेलेपन की घबराहट

सब कुछ झेल जाती है,

न बरसती, न चिल्लाती

ये मीठी-मीठी पलकें।

 

बाल मनोभावों को महसूस करते हुए तितली रानी एकदम बच्चों की तरह नजर आती और कहती हैं –

तितली रानी को ना,

रंग बिरंगी नीली, काली,

कई रंग के पंख तुम्हारे

मेरा दिल बहलाओ ना।

 

संवाद को शब्दांकित करते हुए रुपा जी महसूस करती हैं –

बातें होती साथ बैठ नई पुरानी

दो पल देकर मिलती खुशी अनजानी,

घर के हर लोगों को मिलता सूकून

ईश्वर भी होता प्रसन्न, खिलता प्रसून।

 

संग्रह के अंत में चंद क्षणिकाओं में आखिरी क्षणिका विनम्रता से अपने भाव कुछ यूँ प्रकट करती हैं –

वारिश पाकर फूटीं नई कोंपलें

फलों से लेंगी डालियां किसी दिन,

उन झुकी डालियों से सीखेंगे विनम्रता

आज के बच्चे किसी दिन।

 

संग्रह की रचनाएं सामाजिक, व्यवहारिक और आत्मचिंतन के साथ अनुभवों और मार्मिक, भावुक और संवेदनशीलता का सम्मिश्रण है। रचनाएं छोटी जरुर हैं, पर भाव, भाषा, कथ्य और शिल्प के स्तर पर अपने प्रभाव छोड़ने में समर्थ और पाठकों के अंतस में जगह बनाने में समर्थ हैं।

संक्षेप में निश्चित ही प्रथम संग्रह के रुप में ‘हमने देखा एक ज़माना’ काव्य संग्रह अपने नाम को सार्थक करता है। जिसे कवयित्री की मौन उपलब्धि कहना न्याय संगत ही होगा। जिसका विराट स्वरूप भविष्य के गर्भ में अंकुरित होता महसूस किया जा सकता है।

कवयित्री रुपा माला के काव्य संग्रह ‘हमने देखा एक ज़माना’ की सफलता के प्रति आश्वस्त होते हुए उनके उज्जवल पारिवारिक, सामाजिक और साहित्यिक भविष्य की शुभेच्छा ओं के साथ…..।

 

गोण्डा उत्तर प्रदेश