एक ख़्वाब देखा – ज्योती वर्णवाल

शीर्षक: एक ख़्वाब देखा

विद्या: कविता

एक ख़्वाब देखा मैंने भी सखी,

कि मेरा भी अपना एक मान हो,

महज़ वजूद ही न हो मेरा,

मेरी अपनी भी कोई पहचान हो।

मन करता है मैं भी दो पैसे कमाऊं,

अपनी मेहनत का कोई ज़रिया हो,

ख़ुद की कमाई अपनों पर वारूं,

खुशियों का छोटा सा दरिया हो।

माँ के लिए प्यारा सा उपहार खरीदूं,

पिताजी के लिए एक बटुआ लाऊं,

अपनी कमाई का वो पहला हिस्सा,

उनके चरणों में बड़े गर्व से सजाऊं।

कहते हैं सब सखी, यहाँ दुनिया में,

जो कमाती हैं, सम्मान वही पाती हैं,

वरना घर की औरतें तो अक्सर,

दाल-मोठ के बराबर समझी जाती हैं।

मैं भी चाहती हूँ सखी, ये ख़्वाब पूरा हो,

छोटा ही सही, पर मेरा भी काम हो,

घर हो या बाहर, हर चौखट पर,

सिर उठा के चलूँ, ऐसा मेरा नाम हो।

एक ख़्वाब देखा मैंने भी सखी…

हाँ, एक ख़्वाब देखा।

 

रचनाकार ज्योती वर्णवाल

नवादा (बिहार)