बीमारी में खुशियों का तड़का
1. ठंड ने जब हम दोनों को घेरा, साथ हम बीमार हुए,
2. बेटा बना सहारा हमारा, हम उसके लाड़ के हकदार हुए।
3. गरम पानी से लेकर दवाइयाँ, वो दौड़-दौड़ कर लाता था,
4. कभी पैर दबाता, कभी सर, वो अपना फर्ज निभाता था।
5. पतिदेव का मन जब डोला, बोले मखाने खाने हैं,
6. बेटा झटपट घी-मखाने ले आया, जो खुशियों के बहाने हैं।
7. भून के लाया जब वो थाली, हम तीनों ने साथ खाया,
8. पर नमक तेज़ पाकर पतिदेव ने, थोड़ा सा मुंह बनाया।
9. बोले, “बेटा नमक ज़्यादा है”, तब मैंने चुटकी ली,
10. “नई दुल्हन लाए हो बुढ़ापे में, सीखने में वक्त तो लेगी ही!”
11. मेरी बात सुन खिलखिला उठे, घर का कोना-कोना हँस पड़ा,
12. बीमार माँ-बाप को हँसता देख, बेटे का चेहरा भी खिल उठा।
13. बेटा बोला, “माँ पानी पी लो, वरना ठंडा हो जाएगा”,
14. हंसी के मारे पानी कंबल पर गिरा, जो अब यादों का हिस्सा बन जाएगा।
15. मैंने कहा, “छूकर देख ले पानी, ठंडा है या गरम अभी,”
16. खिलखिला कर हँसा वो लाड़ला, भूल गए हम अपनी पीड़ा सभी।
कितना खुशनसीब है वो घर जहाँ ऐसा बेटा और ऐसी हंसी हो!
रचनाकार ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)