अष्टांग योग के नियमों में ईश्वर प्रणिधान का महत्व: कैवल्य की ओर साधना का पथ

अष्टांग योग के नियमों में ईश्वर प्रणिधान का महत्व: कैवल्य की ओर साधना का पथ

बस्ती। योगदर्शन में अष्टांग योग के दूसरे भाग नियम का पाँचवाँ सोपान ईश्वर प्रणिधान माना गया है। ईश्वर प्रणिधान के माध्यम से साधक सांसारिक दुखों से मुक्त होकर कैवल्य की ओर अग्रसर हो सकता है। इसका मूल भाव अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर स्वयं को ईश्वरीय सत्ता के अधीन कर देना है।

योगाचार्य डॉ. नवीन सिंह ने ईश्वर प्रणिधान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब साधक अपने जीवन के प्रत्येक कर्म—सुख-दुख, लाभ-हानि और सफलता-असफलता—को ईश्वर को समर्पित कर देता है, तब उसका मन स्थिर और निर्मल होने लगता है। संतों ने भी भजन के माध्यम से इस भाव को अभिव्यक्त किया है—

“तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो,

तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो।”

डॉ. सिंह के अनुसार ईश्वर को सर्वस्व समर्पित करने से मन को अच्छे कर्मों के लिए शक्ति, ऊर्जा और उत्साह प्राप्त होता है। वहीं बुरे कर्मों के प्रति मन में भय, शंका, लज्जा और संकोच उत्पन्न होता है, जिससे साधक स्वाभाविक रूप से सद्कर्मों की ओर प्रवृत्त होता है। इस प्रक्रिया में अच्छे कर्मों की निरंतरता बनी रहती है और बुरे कर्मों की पुनरावृत्ति रुकने लगती है।

उन्होंने बताया कि ईश्वर प्रणिधान के अभ्यास से व्यक्ति का दृष्टिकोण व्यापक होता है। समस्त जीवों के प्रति घृणा और द्वेष का भाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है तथा उसके स्थान पर अनुराग, करुणा और सम्मान का भाव जागृत होता है। यह भाव न केवल व्यक्तिगत जीवन को शुद्ध करता है, बल्कि समाज में भी सौहार्द और समरसता को बढ़ावा देता है।

अंत में उन्होंने आह्वान किया कि सभी साधक अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर उनकी अनंत ऊर्जा से अनुप्राणित हों, ताकि जीवन में शांति, संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की जा सके।

— डॉ. नवीन सिंह

योगाचार्य

पतंजलि योग पीठ, हरिद्वार (यूनिट बस्ती)