पूस की वो रात: एक माँ का पुनर्जन्म
वो पूस की रात, वो कड़ाके की ठंड,
हवाओं का शोर, वो सन्नाटा प्रचंड।
एक तरफ था स्वाद—पीठा और हलवे की मिठास,
दूजी तरफ बढ़ती पीड़ा, और मिलन की आस।
तुमने कहा था “आऊँगा मैं भी पीठा खाने”,
मैं भोली बैठी रही, झूठे वादे को सच मानने।
तुम तो सो गए दुनिया से रिश्ता तोड़कर,
मैं जूझती रही मौत से, तन्हा मुख मोड़कर।
वो दर्द, वो तड़प, वो अंधेरी रात,
याद आती है आज भी, वो अनकही बात।
जब देह टूट रही थी, और सांसें थी भारी,
सिर्फ तुम्हारी झलक पाने की थी बेकरारी।
सोचा था शायद… ये सफर यहीं थम जाएगा,
मेरे बाद मेरे बच्चे को, कौन गले लगाएगा?
पर उस ठिठुरती रात ने, मुझे एक शक्ति दी,
हारती हुई उम्मीद को, फिर से एक भक्ति दी।
हवाओं की उस ठंड ने, मेरे इरादों को तराशा,
और सुबह के उजाले ने, काट दिया सारा कुशासा।
नन्हा सा फरिश्ता जब मेरी गोद में आया,
पूस की उस बर्फीली रात ने, ममता का सूरज उगाया।
वो रात महज़ एक तारीख नहीं, मेरा अभिमान है,
क्योंकि उसी रात में बसा, मेरे बेटे का प्राण है।
ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)